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Kamada Ekadashi 2022: आज है कामदा एकादशी व्रत, शुभ योग में इस विधि से करें व्रत

Tue, 12 Apr 2022 06:29 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: श्वेता सिंह Updated Tue, 12 Apr 2022 06:29 AM IST
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Kamada Ekadashi 2022 Know the date time puja muhurat puja vidhi and vrat katha
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी कहा जाता है। - फोटो : अमर उजाला

Kamada Ekadashi 2022: कामदा एकादशी हिंदू नववर्ष की पहली एकादशी होती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी कहा जाता है। कामदा एकादशी भगवान वासुदेव  को समर्पित है,  इस शुभ दिन पर श्री विष्णु की पूजा की जाती है। यह एकादशी व्रत भगवान विष्णु की पूजा के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और पापों का नाश होता है। इस एकादशी व्रत के एक दिन पहले यानी दसवें दिन या दशमी, जौ, गेहूं और मूंग आदि को दिन में एक बार भोजन के रूप में सेवन करना चाहिए और भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। इस बार कामदा एकादशी 12 अप्रैल, यानि आज मनाई जा रही है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए व्रत-पूजा की जाए तो सभी पापों से मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं इस दिन का पूजा मुहूर्त , शुभ योग, व्रत विधि और कथा के बारे में। 

Kamada Ekadashi 2022 Know the date time puja muhurat puja vidhi and vrat katha
उदयातिथि के आधार पर 12 अप्रैल को कामदा एकादशी व्रत रखा जाएगा। - फोटो : अमर उजाला

कामदा एकादशी तिथि और पूजा मुहूर्त
एकादशी तिथि आरंभ:  12 अप्रैल, मंगलवार प्रातः 04:30 से 
एकादशी तिथि समाप्त: 13 अप्रैल, बुधवार प्रातः 05:02 तक 
उदयातिथि के आधार पर 12 अप्रैल को कामदा एकादशी व्रत रखा जाएगा।

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शुभ योगों में एकादशी का व्रत और भी शुभ फल देने वाला रहेगा।  - फोटो : अमर उजाला

शुभ योग 
इस दिन आनन्द योग 12 अप्रैल को प्रातः 08:35 तक रहेगा और सर्वार्थसिद्धि योग 12 अप्रैल को ही प्रातः 06:02 से प्रातः 08:35 तक रहेगा। इन शुभ योगों में एकादशी का व्रत और भी शुभ फल देने वाला रहेगा। 

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एकादशी व्रत के एक दिन पहले से ही नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए। - फोटो : अमर उजाला

कामदा एकादशी व्रत विधि 
आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली कामदा एकादशी की पूजा विधि इस प्रकार है:

  • इस दिन स्नान से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें और भगवान की पूजा करें। 
  • एकादशी व्रत के एक दिन पहले से ही नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए। एकादशी के एक दिन पहले यानी 11 अप्रैल, सोमवार को पूरे दिन और रात्रि में संयम पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। 
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • इसके बाद किसी साफ स्थान पर भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। 
  • भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि चीजें चढ़ाएं। 
  • अंत में कपूर आरती करें और प्रसाद बांट दें।
  • मन ही मन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। 
  • संभव हो तो विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करें। 
  • समय-समय पर भगवान विष्णु का स्मरण करें और पूजा स्थल के पास जागरण करें।
  • एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी या बारहवें दिन पारण करें।
  • ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के बाद ही भोजन करें। 
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कामदा एकादशी की कथा भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। - फोटो : अमर उजाला

कामदा एकादशी व्रत की कथा 
कामदा एकादशी की कथा भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। इससे पहले वशिष्ठ मुनि ने इस व्रत की महिमा राजा दिलीप को सुनाई थी, जो इस प्रकार है:
प्राचीन काल में, भोगीपुर शहर में पुंड्रिक नाम का एक राजा शासन करता था। उसके नगर में अनेक अप्सराएं, किन्नर और गंधर्व रहते थे और उनका दरबार इन्हीं लोगों से भरा रहता था। गंधर्व और किन्नर प्रतिदिन गाते थे। ललिता नाम की एक सुंदर अप्सरा थी और उसका पति ललित, एक कुलीन गंधर्व वहां रहता था। दोनों के बीच अपार स्नेह था और वे हमेशा एक-दूसरे की यादों में खोए रहते थे।
एक समय के दौरान जब गंधर्व ललित राजा के दरबार में गा रहे थे, अचानक उन्हें अपनी पत्नी ललिता की याद आई। इस कारण वह अपनी आवाज की पिच को नियंत्रित नहीं कर सके। करकट नाम के एक सर्प ने यह देखा और राजा पुंड्रिक को यह बात बताई। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए और ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया। इसके बाद कई सालों तक ललित दैत्य योनि में घूमता रहा। उसकी पत्नी उसे याद करती रही लेकिन अपने पति को इस हालत में देखकर दुखी हो जाती।
कुछ वर्ष बीतने के बाद ललित पत्नी ललिता विंध्य पर्वत पर ऋषि ऋष्यमुक के पास गई और अपने पति के लिए उपाय पूछने लगी। ऋषि को उन पर दया आई और उन्होंने कामदा एकादशी का व्रत करने को कहा। उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, गंधर्व-पत्नी अपने स्थान पर लौट आईं और कामदा एकादशी का व्रत किया। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से उन्हें अपने श्राप से मुक्ति मिली और उनका गंधर्व प्रकट हुआ।

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