Devshayani Ekadashi Katha : शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवप्रबोधनी एकादशी के दिन जागते हैं। इस दिन के बाद से हिंदू धर्म में मांगलिक कार्यों की एक बार फिर शुरुआत हो जाती है। इस पूरे चार महीने के दौरान कोई भी शुभ कार्य जैसे शादियां, नामकरण, जनेऊ, ग्रह प्रवेश और मुंडन नहीं होते। इस एकादशी को सौभाग्य की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इस दिन उपवास करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन पूरे मन और नियम से पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
Devshayani Ekadashi 2021: आखिर क्यों सोने जाते हैं भगवान विष्णु, क्या हैं इसके पीछे की पौराणिक कथाएं
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वामन भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं थी तो राजा बलि ने भगवान विष्णु से कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रख दें। भगवान वामन ने ऐसा ही किया। इस तरह देवताओं की चिंता खत्म हो गई और वहीं विष्णु भगवान, राजा बलि के दान-धर्म से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा तो बलि ने उनसे पाताल में बसने का वर मांग लिया। बलि की इच्छा पूर्ति के लिए भगवान को पाताल जाना पड़ा।
भगवान विष्णु के पाताल जाने के बाद सभी देवतागण और माता लक्ष्मी चिंतित हो गए। अपने पति भगवान विष्णु को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी गरीब स्त्री बनकर राजा बलि के पास पहुंची और उन्हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी। बदले में भगवान विष्णु को पाताल लोक से वापस ले जाने का वचन ले लिया। पाताल से विदा लेते वक्त भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया कि वह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक पाताल लोक में वास करेंगे। पाताल लोक में उनके रहने की इस अवधि को योगनिद्रा माना जाता है।
मां लक्ष्मी ने दिया सुझाव
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु असुरों का नाश करने तो कभी भक्तों पर कृपा बरसाने के लिए वर्षों सोते नहीं थे। तो कभी अचानक ही वो लाखों वर्षों के लिए सो जाया करते थे। विष्णु जी की इस असमय नींद की वजह से माता लक्ष्मी विश्राम नहीं कर पाती थीं। इसीलिए मां लक्ष्मी ने एक बार विष्णु जी से कहा, हे नाथ! आप समय से नींद नहीं लेते, दिन-रात जागते हैं और फिर कभी अचानक सो जाते हैं। आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें, ऐसा करके मुझे भी विश्राम करने का समय मिल जाएगा। इस बात को सुनकर विष्णु जी मुस्कुराए और बोले, हे देवी! आपने ठीक कहा. मेरे जागने से आप ही नहीं बल्कि सभी देवों को विश्राम नहीं मिल पाता है। मेरी सेवा के कारण आपको भी आराम नहीं मिल पाता। इसीलिए अब से मैं प्रतिवर्ष नियम से चार माह की निद्रा लूंगा। ऐसे आपको और सभी देवगणों को विश्राम का अवसर मिल सकेगा।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक अन्य प्रसंग में एक बार 'योगनिद्रा' ने बड़ी कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे प्रार्थना की -' भगवान आप मुझे अपने अंगों में स्थान दीजिए '। लेकिन श्री हरि ने देखा कि उनका अपना शरीर तो लक्ष्मी के द्वारा अधिष्ठित है । इस तरह का विचार कर श्री विष्णु ने अपने नेत्रों में योगनिद्रा को स्थान दे दिया और योगनिद्रा को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम वर्ष में चार मास मेरे आश्रित रहोगी।