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नवरात्र में आज है चंद्रघंटा देवी की पूजा, दुःखों से मुक्ति के लिए यह उपाय करें
Tue, 04 Oct 2016 10:39 AM IST
अशोक प्रियदर्शी
अशोक प्रियदर्शी
Updated Tue, 04 Oct 2016 10:39 AM IST
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चंद्रघंटा
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इस वर्ष नवरात्र में द्वितीया तिथि दो दिन होने के कारण नवरात्र के चौथे दिन तृतीया तिथि में देवी के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा देवी की पूजा है। देवीभाग्वत् पुराण में बताया गया है कि मां चंद्रघंटा का स्वरूप बेहद सुंदर, मोहक और अलौकिक है। चंद्र के समान सुंदर मां के इस स्वरूप से दिव्य सुगंधियों और दिव्य ध्वनियों का आभास होता है। शक्ति का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। दस भुजाओं वाली यह माता सिंह यानी शेर पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होती हैं।
इनकी उपासना से प्रेत बाधाओं से भी सुरक्षा मिलती है
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दुर्गा पूजा
मां के दस हाथों में ढाल, तलवार, खड्ग, त्रिशूल, धनुष, चक्र, पाश, गदा और वाणों से भरा तरकश है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा सुशोभित है। इनका मुखमंडल शांत, सात्विक, सौम्य किंतु सूर्य के समान तेज वाला है। माता चंद्रघंटा की कृपा से साधक को आलौकिक दिव्य दर्शन एवं दृष्टि प्राप्त होती है। इनकी उपासना से हम हर प्रकार के सांसारिक कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। साधक समस्त पाप बंधन से छूट जाते हैं। इनकी उपासना से प्रेत बाधाओं से भी सुरक्षा मिलती है। योग साधना की सफलता के लिए भी माता चंद्रघंटा की उपासना बहुत ही असरदार होती है।
लाभ पाने के लिए ऐसे करें इनकी पूजा
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ओलंदगंज फलवाली गली में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा।
हमें अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को, विधि-विधान के अनुसार शुद्ध करके मां चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर होना चाहिए। पूजन का संकल्प लेकर वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्ध्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। इसके बाद प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें। मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
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दुखों से मुक्ति के लिए मां को भोग लगाएं
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एक क्लिक में करें दुर्गा मां के दर्शन
- फोटो : Amar Ujala
नवरात्र के तीसरे दिन अर्थात् तृतीया तिथि को माता को दूध चढ़ाएं और इसका दान करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है। सिंदूर और दर्पण भी मां को अर्पित करें। इस देवी की उपासना से भक्तों को भौतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक सुख और शांति भी मिलती है। घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा यानी कलह और अशांति दूर होती है।
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