नवरात्रि के नौ दिन भक्ति, आराधना और संयम के होते हैं, साधक, भक्त गण इन नौ दिनों मां की उपासना पूर्ण संयम से करते हैं, भक्तगण नौ दिन मां की आराधना, साधना करते हैं और इसके पश्चात् हवन और कन्या पूजन का अनुष्ठान करते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व है।
Chaitra Navratri 2021: नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व, इस बात का जरूर रखें ध्यान
कन्याओं में होता है माता का रूप
सनातन धर्म वैसे तो सभी बच्चों में ईश्वर का रूप बताता है किन्तु नवरात्रों में छोटी कन्याओं में माता का रूप बताया जाता है। अष्टमी व नवमी तिथि के दिन तीन से नौ वर्ष की कन्याओं का पूजन किए जाने की परंपरा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती है। छल और कपट से दूर ये कन्याएं पवित्र बताई जाती हैं और कहा जाता है कि जब नवरात्रों में माता पृथ्वी लोक पर आती हैं तो सबसे पहले कन्याओं में ही विराजित होती है। इनका सम्मान करना इन्हें आदर देना ही नवरात्रि में माता की सच्ची उपासना होगी।
शास्त्रों के अनुसार एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो की पूजा से भोग और मोक्ष, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ व काम, चार की पूजा से राज्यपद, पांच की पूजा से विद्या, छ: की पूजा से छ: प्रकार की सिद्धि, सात की पूजा से राज्य, आठ की पूजा से संपदा और नौ की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में दो साल की कन्या कुमारी, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छ: साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शाम्भवी, नौ साल की दुर्गा और दस साल की कन्या सुभद्रा मानी जाती हैं। भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार महामाया भगवती प्रसन्न होकर मनोरथ पूर्ण करती हैं।
वर्तमान परिवेश में देखा जाए तो आज हम कोरोना रूपी संकट से संघर्ष कर रहे हैं। हमें इन नौ दिनों में अपने अंदर ऐसी उर्जा को जाग्रत करना है जिससे हम कोरोना का पूर्ण विनाश कर सकें, और इसके लिए आत्म संयम का पालन अनिवार्य है। शास्त्रों में देश, काल परिस्थिति के अनुसार कार्य करने को कहा गया है। वर्तमान में देश की परिस्थिति के अनुसार घर में रहना भी संयम और साधना का एक अंग है।