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अपरा एकादशी: प्रेत बाधा से मुक्ति और स्वर्ग पाने का अधिकारी बनता है यह व्रत

Thu, 10 May 2018 08:13 AM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 10 May 2018 08:13 AM IST
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apra ekadashi 2018 vrat khatha and importance
ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपर एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 11 मई को है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी, भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी भी कहते है। अपरा एकादशी का व्रत करने से अपार धन-सम्पदा और मान-सम्मान प्राप्त होता है।
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ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष की एकादशी का बड़ा ही महत्व होता है। पद्मपुराण के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को प्रेत योनि में जाकर कष्ट नहीं भोगना पड़ता है। प्रेत योनि से मुक्ति प्रदान करने वाली इस एकादशी का नाम अचला है। 

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अपरा एकादशी व्रत के विषय में कथा है कि प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। इनके छोटा भाई वज्रध्वज जो पापी और अधर्मी था। इसने एक एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। इसके बाद महीध्वज के मृत शरीर को जंगल में ले जाकर पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया।

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अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत यानि में जाना पड़ा। राजा प्रेत रुप में पीपल पर रहने लगा और उस रास्ते से आने जाने वालों को परेशान करने लगा। एक दिन सौभाग्य से उस रास्ते से धौम्य नामक ॠषि गुजरे। ऋषि ने जब प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से सब हाल जान लिया।

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ॠषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का विचार किया और प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। संयोग से उस समय ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि भी थी। ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और एकादशी के पुण्य को राजा को अर्पित कर दिया। इस पुण्य से राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया और दिव्य देह धारण करके स्वर्ग चले गए।

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