मात्र छह सालों के लोक संगीत के करियर में लता पठानिया ने प्रदेश के लोक कलाकारों में अपनी पहचान बनाई है। सरकाघाट की चोलथरा पंचायत के सरौन गांव से संबंध रखने वाली लता पठानिया लोक संगीत को अपनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर मानती हैं। बचपन से ही संगीत का शौक होने के चलते वह हमेशा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रुचि रखती थीं लेकिन उन्हें लंबे समय के बाद वर्ष 2013 से अपने संगीत के करियर को आगे बढ़ाने का मौका मिला।
उनका मानना है कि आज के समय में लोक गीतों को युवा कलाकारों की ओर से जिस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है वह बहुत सराहनीय है क्योंकि समय के साथ लोगों की सोच भी बदलती रहती है। आज के समय में लोक संगीत में नयापन आना उचित है। लता पठानिया की इस कम समय में ही 16 से अधिक एलबम रिलीज हो चुकी हैं।
इन सभी एलबम में उन्होंने अपनी आवाज दी है। इसमें सुन मेरे पिया, श्याम मन भायो और अध्यात्मिक एलबम ओम ने उन्हें पहचान दिलाई है। उनके द्वारा गाए कोमल कुके, बनजारा, सुन मेरे पिया, याद पिया की आए, मैं लाडो हुंदी तेरी गाने अनायास ही श्रोताओं के दिल और दिमाग पर एक छाप छोड़ देते हैं।
वह एक गायिका के साथ-साथ संगीतकार भी हैं। 2013 तक संगीत की दुनिया से कोई उनका रिश्ता नहीं था, मगर बहुत कम समय में ही उन्होंने बुलंदियों को छुआ है। इस समय वह अपनी स्वयं की एल सीरीज प्रोडक्शन कंपनी में नए चेहरों और संगीत में रुचि रखने वालों को भी संगीत के टिप्स दे रही हैं।
हाल ही में लता पठानिया को हिमाचल कला मंच की ओर से शान-ए-मंडी से नवाजा गया है। इसके साथ-साथ लता पठानिया एक निजी स्कूल की प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उनके उत्कृष्ट कार्यों को लेकर उन्हें प्राइड ऑफ एजूकेशन अवॉर्ड के तहत वेस्ट टीचर के सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। वहीं सामाजिक गतिविधियों को लेकर स्वच्छता अभियान के तहत 2015 व 2016 में दो बार हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के हाथों सम्मान हासिल कर चुकी हैं।