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Nauradehi Sanctuary: कभी भेड़िए हुआ करते थे नौरादेही की पहचान, बाघिन राधा ने अभयारण्य को बाघों से किया आबाद

Tue, 11 Apr 2023 11:35 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Tue, 11 Apr 2023 11:35 AM IST
सार

Nauradehi Sanctuary: कभी भेड़िए हुआ करते थे नौरादेही की पहचान, बाघिन राधा ने अभ्यारण्य को बाघों से किया आबाद

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Tigress Radha gave new identity to Nauradehi Sanctuary, populated the forest with tigers in five years
बाघिन राधा - फोटो : अमर उजाला
दमोह जिले की सीमा से लगे नौरादेही अभयारण्य को अनाथ बाघिन राधा ने पांच साल में बाघों के परिवार से आबाद कर दिया। 1975 में इस अभयारण्य की स्थापना हुई, लेकिन 48 वर्षों तक यह अभयारण्य गुमनाम रहा और इसे भेड़ियों का जंगल कहा जाता था, भले ही यहां कई मांसाहारी और शाकाहारी जंगली जानवर थे, लेकिन देश और प्रदेश के पटल पर पहचान 2018 में मिली जब बाघिन राधा और बाघ किशन को बाघों के विस्थापन प्रक्रिया के तहत यहां लाया गया। इसके बाद बाघ विहीन यह अभयारण्य बाघों के परिवार से आबाद हो गया और सभी बाघ स्वस्थ और सुरक्षित हैं। सबसे बड़ी बात 12 बाघों की सुरक्षा के लिए 150 वनकर्मी तैनात किए गए हैं।


इस तरह शुरू हुई कहानी
नौरादेही अभयारण्य में बाघों के विस्थापन प्रक्रिया के तहत 2018 में अनाथ बाघिन राधा को अप्रैल माह में कान्हा नेशनल पार्क से लाया गया था, उस समय उसकी आयु ढाई वर्ष थी। कुछ दिन बाद ही चार वर्षीय बाघ किशन को बांधवगढ़ से लाया गया था। इनके नाम पहले राधा और किशन रखे गए थे, उसके बाद बाघिन को एन वन और बाघ को एन टू नाम दिया गया। इसके बाद बाघों का परिवार आगे बढ़ा और पांच वर्ष में यहां चारों ओर बाघ ही बाघ दिखाई देने लगे हैं।
Tigress Radha gave new identity to Nauradehi Sanctuary, populated the forest with tigers in five years
बाघिन राधा के शावक - फोटो : अमर उजाला
अनाथ बाघिन ने बसाया अभयारण्य
नौरादेही अभयारण्य की स्थापना 1975 में हुई थी। स्थापना के पूर्व इस अभयारण्य में बाघ रहे होंगे, लेकिन 2010 में एक बाघ घूमता हुआ यहां पहुंच गया था, जो कुछ वर्षों तक यहां के जंगल में रहा, लेकिन उसके साथ कोई दूसरा बाघ नहीं था, इसलिए वह चला गया। संभवत: यह बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व से यहां आ गया था। इसके बाद 2018 में वन विभाग ने अभयारण्य को बाघ का ठिकाना बनाने का प्रयास किया और कान्हा नेशनल पार्क से अनाथ बाघिन को लाकर अभयारण्य के बाड़े में छोड़ा गया। उसके एक बाघ किशन को लाया गया जो बाड़ा तोड़कर भाग निकला और बाघिन के बाड़े के पास घूमने लगा। इसके बाद जब बाघिन को खुले जंगल में छोड़ा गया तो दोनों की मेटिंग के बाद बाघिन राधा ने 2019 में तीन शावकों को जन्म दिया, जिसमें दो मादा और एक नर था जो पूरी तरह सुरक्षित हैं और दूसरी बार में राधा ने चार शावकों को जन्म दिया है इनमें तीन मादा और एक नर हैं। जबकि राधा की बेटी एन 12 ने दो शावकों को जन्म दिया है।

सर्व सुविधा युक्त है अभयारण्य
नौरादेही अभयारण्य जलवायु के आधार पर मांसाहारी और शाकाहारी जानवरों के लिए सर्वसुविधा युक्त है। यहां बड़ी-बड़ी नदियों के साथ जलाशय हैं, जिनमें बारह माह पानी भरा रहता है। बाघों के भोजन के लिए शाकाहारी जानवरों के साथ मवेशी भी हैं। रहने के लिए अनेक झीलें, झरने, गुफाये हैं। 2018 में यहां लाए बाघों को आज तक कोई नुकसान नहीं हुआ। नौरादेही को 12वां बाघ उपहार में मिला है। बाघिन राधा के परिवार से 11 बाघ हैं जबकि एक बाघ ढाई साल पहले नौरादेही पहुंचा था। जिसे राधा और किशन के परिवार ने अपना लिया, माना जाता है कि यह बाघ संभवत: पन्ना टाइगर रिजर्व से ही आया है। बाघों की निगरानी के लिए यहां वन अमला भी 24 घंटे अपनी सेवाएं दे रहा है और 150 वनकर्मी 12 बाघों की सुरक्षा में तैनात हैं।

कुशल प्रयासों से बाघ सुरक्षित
नौरादेही अभयारण्य के अंतर्गत छह रेंज आती हैं। इन रेंजों में नौरादेही के अलावा मुहली, झापन, सिंगपुर, डोंगरगांव, सर्रा रेंज हैं। यहां प्रत्येक रेंज पर वनकर्मी तैनात रहते हैं जो जगल में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति की पूरी निगरानी करते हैं। इसलिये अभयारण्य में शिकारी भी प्रवेश नहीं कर सकते। वनकर्मियों के साथ जानवरों और जंगल की सुरक्षा के लिये डॉग स्कॉट की टीम भी मौजूद रहती है जो समय-समय पर मूवमेंट करती है। इसके अलावा अभयारण्य में जगह-जगह पर कैमरे लगाए गए हैं। बाघ, बाघिन के साथ अन्य जानवरों की पूरी निगरानी करते हैं। अभयारण्य में रहने वाले लोगों को भी यहां से रोजगार मिलता है, इसलिये ग्रामीण भी जंगल और यहां रहने वाले जानवरों की सुरक्षा करते हैं।
 
Tigress Radha gave new identity to Nauradehi Sanctuary, populated the forest with tigers in five years
नौरादेही अभयारण्य - फोटो : अमर उजाला
भेड़ियों के जंगल से थी पहचान
नौरदेही अभयारण्य की स्थापना 1975 में हुई थी और 48 वर्ष बीतने के बाद भी इसे पहचान नहीं मिली थी क्योंकि टाइगर से ही जंगल पहचाना जाता है। इसलिए इस अभयारण्य के जंगल को भेड़ियों का जंगल कहा जाता था क्योंकि इनकी संख्या अधिक थी, लेकिन 2018 में बाघ-बाघिन के आने के बाद यहां का जंगल बाघों से आबाद हो गया और इसे बाघों का अभयारण्य कहा जाने लगा। इस अभयारण्य को देखने के लिए देश के साथ विदेशी सैलानी भी आते हैं।

जलवायु की अनुकूलता से मिली सफलता
अभयारण्य में बाघों की सुरक्षा में 150 वनकर्मियों को लगाया गया है जो पूरे समय निगरानी करते हैं। बाघों के लिये नौरादेही अभयारण्य की जलवायु पूरी तरह अनुकूल है। यहां गुफायें भी हैं भोजन और पानी की पूरी व्यवस्था है। शाकाहारी जानवर भी बड़ी तादाद में हैं। वर्तमान में एक दर्जन बाघ हैं जो पूरी तरह सुरक्षित होने के साथ स्वस्थ हैं आगे और बाघों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।
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