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चेतावनीः बस 30 साल मिलेगा नर्मदा का पानी, उसके बाद सूख जाएगी नदी

Wed, 29 May 2024 10:50 PM IST
अर्जुन रिछारिया न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: अर्जुन रिछारिया Updated Wed, 29 May 2024 10:50 PM IST
सार

ख्यात पर्यावरणविद्ध डॉ. सुनील चतुर्वेदी ने चेताया और कहा कि सतपुड़ा के घने जंगल जिस तरह से कट रहे हैं नर्मदा सिकुड़ जाएगी।

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narmada river pollution loss issue
नर्मदा नदी - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल, इंदौर
ख्यात पर्यावरणविद्ध डॉ. सुनील चतुर्वेदी ने चेताया और कहा कि सतपुड़ा के घने जंगल जिस तरह से कट रहे हैं और नर्मदा क्षेत्र के आसपास जिस तरह से बांधों के निर्माण हो रहे हैं, उसके चलते जीवनदायिनी नदी नर्मदा दिनों दिन सिकुड़ती जा रही है। ऐसे में इंदौर को नर्मदा का पानी अधिकतम 30 वर्ष और मिल सकता है। इसके बाद नदी बहुत हद तक सूख जाएगी। अतः हम आज से ही वर्षा के जल को सहेजें और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं।


डॉ. चतुर्वेदी आज श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति सभाग्रह् में अभ्यास मंडल के मंच पर मुख्य वक्ता के बतौर बोल रहे थे। जलवायु परिवर्तन के दौर में जल संरक्षण की आवश्यकता एवं महत्व विषय पर बोलते हुए आगे कहा कि जल ही जीवन है और हम सब जल पर निर्भर हैं। बीते कुछ वर्षों से जल संकट बढ़ता जा रहा है। नदियां सूखकर नाले में तब्दील हो रही हैं। कुएं और बावड़ियां कम होते जा रही हैं। पोखर और तालाब भी या तो सूख चुके हैं अथवा उन पर अतिक्रमण हो गया है। ऐसे में केवल वर्षा का पानी ही अब हमारे जल का बड़ा स्रोत रह गया है। जल की कमी का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम जितना पानी जमीन से निकाल रहे हैं उतना सहेज नहीं रहे हैं। अतः यह संकट प्रकृति प्रदत्त कम और मानव प्रदत्त अधिक है। 
narmada river pollution loss issue
डॉ. सुनील चतुर्वेदी ने संबोधित किया। - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल, इंदौर
घर की छत से डेढ़ लाख लीटर पानी संरक्षित होगा
डॉ. चतुर्वेदी ने आगे कहा कि वर्षा के जल का संरक्षण कर हम एक बड़े संकट से बच सकते हैं। सबसे अच्छा तरीका यह है कि छतों पर एकत्रित हुए जल को हम  पाइप के सहारे जमीन में उतारे। एक अनुमान के मुताबिक वर्षा ऋतु में 1500 वर्ग फीट की छत पर करीब डेढ़ लाख लीटर पानी एकत्रित होता है जिसमें से अधिकांश बह जाता है। वर्षा के जल को सहेजने का एक तरीका जमीन में चार बाय चार फीट का गड्डा खोदें और उसमें नीचे तक पाइप डालें। इन दोनों तरकीब से भू जल स्तर बढ़ेगा। वर्षा जल से भूजल स्तर को बढ़ाते समय अधिक सावधानी की भी जरूरत है, क्योंकि अगर भूमि पर कार्बन, प्लास्टिक या और कोई अपशिष्ट है तो वह भी वर्षा जल के साथ भूमि में जाएगा, जो रोग का कारण बनेगा। पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक होगी तो कैंसर का खतरा और यदि फ्लोराइड की मात्रा बढ़ गई तो हड्डियों का कमजोर होना तय है। अतः जिस जल को हम जीवन कहते हैं, वह कभी कभी किलर भी बन जाता है। तीसरा तरीका छत के ऊपर हजार दो हजार लीटर की पानी की टंकी रखें और उसमें वर्षा का जल एकत्रित कर उसे घरेलू कार्यों में उपयोग करें।
 
अतिथियों को स्वागत में तुलसी के पौधे दिए
मंच पर अभ्यास मंडल के अध्यक्ष रामेश्वर गुप्ता और सचिव माला ठाकुर भी उपस्थित थे। अशोक कोठारी, स्वप्निल व्यास, एनके उपाध्याय, हबीब बेग आदि ने अतिथियों का स्वागत तुलसी के पौधे से किया। अतिथियों को प्रतीक चिन्ह पर्यावरणविद एसएल गर्ग और वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने प्रदान किए। कार्यक्रम का संचालन वैशाली खरे ने किया और आभार माना सुनील व्यास ने। कार्यक्रम में पर्यावरणविद् ओपी जोशी, शंकर गर्ग, ओम नरेड़ा, नेताजी मोहिते, संजय गुप्ता, शरद कटारिया, दशरथ गोलाने, अनिल भोजे, किशन सोमानी, फादर लकारा, कुणाल भंवर, ग्रीष्मा त्रिवेदी, दीप्ति गौर आदि बड़ी संख्या में उपस्थित थे। 
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