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Indore: 350 करोड़ का फ्लाईओवर शिलान्यास से पहले विवादों में, एक्सपर्ट का दावा- 10% भी ट्रैफिक नहीं सुधरने वाला
सार
Indore: 350 करोड़ का फ्लाईओवर शिलान्यास से पहले विवादों में, एक्सपर्ट का दावा- 10% भी ट्रैफिक नहीं सुधरने वाला
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इंदौर लगातार बिगड़ता ट्रैफिक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
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इंदौर में अब तक के सबसे लंबे कहे जा रहे फ्लाईओवर या एलिवेटेड रोड के निर्माण को मंजूरी मिलते ही अब इसकी उपयोगिता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। ट्रैफिक की समस्या 10 प्रतिशत भी हल नहीं होने के दावे किए जाने लगे हैं। इसकी स्वीकृति के समय भी आपत्तियां जताई गई थीं, जिसके बाद हुई बैठक में कुछ बदलाव के साथ इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिली है। कहा जा रहा है कि बीआरटीएस जैसा ही ये प्रोजेक्ट भी प्रयोगधर्मिता की भेंट चढ़ेगा। ऐसा क्यों कह रहे हैं जानकार, क्या हैं आपत्तियां, जानते हैं इस रिपोर्ट में
शहर में सबसे बड़े एलिवेटेड रोड को मंजूरी मिली है। (प्रतीकात्मक चित्र)
- फोटो : सोशल मीडिया
क्या हैं वो आपत्तियां, जो इस पर सवाल खड़े कर रहीं
इस फ्लाईओवर को लेकर एक्सपर्ट्स ने बताया कि इसके निर्माण की मांग कभी भी, किसी ने भी नहीं की। इसके बदले पलासिया चौराहे पर शिवाजी प्रतिमा पर, विजय नगर चौराहे पर, नौलखा चौराहे पर ट्रैफिक को देखते हुए पुलों की मांग कई समय से हो रही है। इस एलिवेटेड रोड के लिए कभी भी टेंडर के पहले ऐसा कोई सर्वे नहीं किया, जिसमें इसकी उपयोगिता बताई गई हो या सिद्ध की गई हो। पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कोई सर्वे नहीं किया, केवल ऊपर के आदेश अनुसार टेंडर बुला लिए हैं। क्या उपयोगिता होगी, कितना लाभ होगा इसका भी कोई आंकड़ा उनके पास नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक टेंडर होने के बाद उपयोगिता नहीं होने की बात तत्कालीन मंत्री के ध्यान में लाई गई थी, मंत्रीजी ने इस पर चर्चा भी की। उसके बाद अधिकारियों ने 3 भुजा- ग्रेटर कैलाश रोड, गीता भवन रोड और शिवाजी प्रतिमा पर एक-एक भुजा बगैर किसी सर्वे के उतार दी। इस सबके बावजूद भी कोई निश्चित आंकड़ा उपयोगिता का उनके पास नहीं है। इस पूरे टेंडर में, एबी रोड पर उपलब्ध विभिन्न सर्विसेस/ सुविधा जिसमें पानी की लाइन, ड्रेनेज लाइन, टेलीफोन लाइन, बिजली की लाइन, बीआरटीएस की लाइन उसके स्टेशन, मेट्रो लाइन आदि का समावेश और उससे संबंधित खर्च शामिल नहीं हैं।
ये सब बातें सांसद शंकर लालवानी के ध्यानार्थ भी लाई गई थीं, जिस पर उन्होंने मुख्यमंत्री से और प्रमुख सचिव से बात की। विभागीय अधिकारियों और शहर के विशेषज्ञ प्रोफेसर ओपी भाटिया, पूर्व चीफ इंजीनियर सतीश गर्ग, प्रो. वंदना तारे, पूर्व सिटी इंजीनियर एसके बायस, नारंगजी, इंजीनियर अतुल सेठ और पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों की एक बैठक बुलाई। इसमें सर्वसम्मति से उपयोगिता को जानने के लिए यातायात का सर्वे करने को कहा गया। विभाग ने 15 दिन में इसे करने का वादा भी किया। करीब एक महीने में विभाग ने सर्वे कर दिया, जिसकी जानकारी सभी लोगों को भेजी गई। इस रिपोर्ट में केवल विभिन्न चौराहों के कुछ आंकड़ों की जानकारी थी। इसमें कोई आधुनिक, वैज्ञानिक तरीकों का कोई इस्तेमाल नहीं किया था। न ही कोई तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार था। जिस कंपनी से इसे करवाया गया उसका नाम भी नहीं था। जानकारी निकालने पर मालूम हुआ कि उस कंपनी को इसका कोई अनुभव नहीं था और जैसा विभाग ने कहा, उसने वैसा करके विभाग को दे दिया।
एक्सपर्ट की मानें तो इंदौर के किसी मास्टर प्लान में इस एलिवेटेड रोड की आवश्यकता नहीं बताई गई है। एलिवेटेड रोड पुल बनाने में 2 साल का समय दिया है। मगर कम से कम 4 साल लगेंगे। वास्तविक रूप से आज उपलब्ध यातायात का अध्ययन करने पर एलाआईजी और नौलखा चौराहा के बीच जितना ट्रैफिक है, इसमें तीन भुजा- ग्रेटर कैलाश रोड, गीता भवन और शिवाजी प्रतिमा को भी मिला लें तो भी, 10 प्रतिशत से भी कम ट्रैफिक होगा जो इस एलिवेटेड रोड पर जाएगा। बाकी 90% ट्रैफिक नीचे ही रहेगा। नीचे उपलब्ध रोड की चौड़ाई आज उपलब्ध चौड़ाई से कम हो जाएगी। शिवाजी से एलआईजी तक तो यात्रा के लिए जगह और और कम हो जाएगी। जाम ज्यादा लगेगा। पलासिया चौराहा, शिवाजी जंक्शन, एलाआईजी चौराहे पर समस्या और विकराल हो जाएगी। इसका कोई अध्ययन नहीं किया गया है। निर्माण के चार वर्षों में ट्रैफिक को कैसे नियंत्रित करेंगे, इसका जनता पर क्या भार पड़ेगा या मार पड़ेगी इसका कोई आकलन नहीं किया गया है।
इस फ्लाईओवर को लेकर एक्सपर्ट्स ने बताया कि इसके निर्माण की मांग कभी भी, किसी ने भी नहीं की। इसके बदले पलासिया चौराहे पर शिवाजी प्रतिमा पर, विजय नगर चौराहे पर, नौलखा चौराहे पर ट्रैफिक को देखते हुए पुलों की मांग कई समय से हो रही है। इस एलिवेटेड रोड के लिए कभी भी टेंडर के पहले ऐसा कोई सर्वे नहीं किया, जिसमें इसकी उपयोगिता बताई गई हो या सिद्ध की गई हो। पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कोई सर्वे नहीं किया, केवल ऊपर के आदेश अनुसार टेंडर बुला लिए हैं। क्या उपयोगिता होगी, कितना लाभ होगा इसका भी कोई आंकड़ा उनके पास नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक टेंडर होने के बाद उपयोगिता नहीं होने की बात तत्कालीन मंत्री के ध्यान में लाई गई थी, मंत्रीजी ने इस पर चर्चा भी की। उसके बाद अधिकारियों ने 3 भुजा- ग्रेटर कैलाश रोड, गीता भवन रोड और शिवाजी प्रतिमा पर एक-एक भुजा बगैर किसी सर्वे के उतार दी। इस सबके बावजूद भी कोई निश्चित आंकड़ा उपयोगिता का उनके पास नहीं है। इस पूरे टेंडर में, एबी रोड पर उपलब्ध विभिन्न सर्विसेस/ सुविधा जिसमें पानी की लाइन, ड्रेनेज लाइन, टेलीफोन लाइन, बिजली की लाइन, बीआरटीएस की लाइन उसके स्टेशन, मेट्रो लाइन आदि का समावेश और उससे संबंधित खर्च शामिल नहीं हैं।
ये सब बातें सांसद शंकर लालवानी के ध्यानार्थ भी लाई गई थीं, जिस पर उन्होंने मुख्यमंत्री से और प्रमुख सचिव से बात की। विभागीय अधिकारियों और शहर के विशेषज्ञ प्रोफेसर ओपी भाटिया, पूर्व चीफ इंजीनियर सतीश गर्ग, प्रो. वंदना तारे, पूर्व सिटी इंजीनियर एसके बायस, नारंगजी, इंजीनियर अतुल सेठ और पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों की एक बैठक बुलाई। इसमें सर्वसम्मति से उपयोगिता को जानने के लिए यातायात का सर्वे करने को कहा गया। विभाग ने 15 दिन में इसे करने का वादा भी किया। करीब एक महीने में विभाग ने सर्वे कर दिया, जिसकी जानकारी सभी लोगों को भेजी गई। इस रिपोर्ट में केवल विभिन्न चौराहों के कुछ आंकड़ों की जानकारी थी। इसमें कोई आधुनिक, वैज्ञानिक तरीकों का कोई इस्तेमाल नहीं किया था। न ही कोई तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार था। जिस कंपनी से इसे करवाया गया उसका नाम भी नहीं था। जानकारी निकालने पर मालूम हुआ कि उस कंपनी को इसका कोई अनुभव नहीं था और जैसा विभाग ने कहा, उसने वैसा करके विभाग को दे दिया।
एक्सपर्ट की मानें तो इंदौर के किसी मास्टर प्लान में इस एलिवेटेड रोड की आवश्यकता नहीं बताई गई है। एलिवेटेड रोड पुल बनाने में 2 साल का समय दिया है। मगर कम से कम 4 साल लगेंगे। वास्तविक रूप से आज उपलब्ध यातायात का अध्ययन करने पर एलाआईजी और नौलखा चौराहा के बीच जितना ट्रैफिक है, इसमें तीन भुजा- ग्रेटर कैलाश रोड, गीता भवन और शिवाजी प्रतिमा को भी मिला लें तो भी, 10 प्रतिशत से भी कम ट्रैफिक होगा जो इस एलिवेटेड रोड पर जाएगा। बाकी 90% ट्रैफिक नीचे ही रहेगा। नीचे उपलब्ध रोड की चौड़ाई आज उपलब्ध चौड़ाई से कम हो जाएगी। शिवाजी से एलआईजी तक तो यात्रा के लिए जगह और और कम हो जाएगी। जाम ज्यादा लगेगा। पलासिया चौराहा, शिवाजी जंक्शन, एलाआईजी चौराहे पर समस्या और विकराल हो जाएगी। इसका कोई अध्ययन नहीं किया गया है। निर्माण के चार वर्षों में ट्रैफिक को कैसे नियंत्रित करेंगे, इसका जनता पर क्या भार पड़ेगा या मार पड़ेगी इसका कोई आकलन नहीं किया गया है।
नए फ्लायओवर का निर्माण ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए किया जा रहा है। (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
एक्सपर्ट्स ने क्या सुझाव बताए
एक्सपर्ट बताते हैं कि इस योजना को तत्काल रोक कर पूरा अध्ययन वैज्ञानिक आधार पर करवाना चाहिए। जिसमें इस पर आने वाले सारे चौराहों की, सारी भुजाओं के ट्रैफिक का पूरा अध्ययन किया जाए। फिर आकलन किया जाए कि शहर के लिए क्या उपयोगी होगा। एक मास्टर प्लान प्रस्तुत किया जाए। इसे जनता को भी बताना चाहिए और फिर जो उचित हो निर्णय करना चाहिए।
विशेषज्ञों ने बताया कि अभी इसकी लागत 325-350 करोड़ बताई जा रही है। काम पूरा होते-होते और सर्विसेस का खर्चा जोड़ते-जोड़ते यह बढ़कर एक अनुमान के मुताबिक 400 करोड़ से ज्यादा होगी। एक्सपर्ट के मुताबिक वर्तमान में जहां पर सबसे ज्यादा ट्रैफिक कंजक्शन होता है, उसमें से पलासिया चौराहा, दूसरे शिवाजी वाटिका और तीसरे नेमावर चौराहे चौराहे और चौथा विजयनगर चौराहा। अगर पूर्व प्लान के अनुसार पलासिया पर ग्रेड सेपरेटर बनाया जाता है, जिसकी लागत आएगी 70 करोड़, इसी प्रकार शिवाजी प्रतिमा पर, नेमावर चौराहे और विजयनगर चौराहे पर पुल बनाए जाते हैं तो उसकी लागत भी करीब करीब 50 करोड़ प्रत्येक की रहने की संभावना है। इस तरीके से मात्र 220 करोड़ रुपये में शहर को बहुत अच्छी सुविधा मिल सकती है। जनता को राहत भी बहुत ज्यादा मिलेगी। संबे समय के लिए, इसकी उपयोगिता भी कई गुना ज्यादा होगी, बजाए कि एलिवेटेड कॉरिडोर के।
एक्सपर्ट ओपिनियन
इस एलिवेटेड रोड का बारीकी से अध्ययन करने वाले इंजीनियर अतुल सेठ का कहना है कि शंकर लालवानी के चुनाव के समय नितिन गडकरी शहर में थे, उन्हें ट्रैफिक की समस्या बताई गई तो उन्होंने सुझाव मांगे। तत्कालिक सुझाव के रूप में इस एलिवेटेड रोड को उन्होंने मंजूरी दे दी। 350 करोड़ की मंजूरी भी दे दी। राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। सज्जन सिंह वर्मा ने गडकरी से इस सड़क के लिए फंड मंजूर करा लिया और श्रेय लेने के चक्कर में बिना प्लानिंग के इसके टेंडर करा दिए। पीडब्ल्यूडी ने इसका काम भी शुरू कर दिया। आपत्तियों के बाद भी मामूली परिवर्तन के बाद इसे मंजूरी दी गई है, समस्या जस की तस रहने वाली है। पूरे एबी रोड का वास्तविक सर्वे होकर हर चौराहे की प्लानिंग अलग-अलग पुल के रूप में होना चाहिए तो ही इंदौर को पैसे का पूरा सदुपयोग प्राप्त होगा।
एक्सपर्ट बताते हैं कि इस योजना को तत्काल रोक कर पूरा अध्ययन वैज्ञानिक आधार पर करवाना चाहिए। जिसमें इस पर आने वाले सारे चौराहों की, सारी भुजाओं के ट्रैफिक का पूरा अध्ययन किया जाए। फिर आकलन किया जाए कि शहर के लिए क्या उपयोगी होगा। एक मास्टर प्लान प्रस्तुत किया जाए। इसे जनता को भी बताना चाहिए और फिर जो उचित हो निर्णय करना चाहिए।
विशेषज्ञों ने बताया कि अभी इसकी लागत 325-350 करोड़ बताई जा रही है। काम पूरा होते-होते और सर्विसेस का खर्चा जोड़ते-जोड़ते यह बढ़कर एक अनुमान के मुताबिक 400 करोड़ से ज्यादा होगी। एक्सपर्ट के मुताबिक वर्तमान में जहां पर सबसे ज्यादा ट्रैफिक कंजक्शन होता है, उसमें से पलासिया चौराहा, दूसरे शिवाजी वाटिका और तीसरे नेमावर चौराहे चौराहे और चौथा विजयनगर चौराहा। अगर पूर्व प्लान के अनुसार पलासिया पर ग्रेड सेपरेटर बनाया जाता है, जिसकी लागत आएगी 70 करोड़, इसी प्रकार शिवाजी प्रतिमा पर, नेमावर चौराहे और विजयनगर चौराहे पर पुल बनाए जाते हैं तो उसकी लागत भी करीब करीब 50 करोड़ प्रत्येक की रहने की संभावना है। इस तरीके से मात्र 220 करोड़ रुपये में शहर को बहुत अच्छी सुविधा मिल सकती है। जनता को राहत भी बहुत ज्यादा मिलेगी। संबे समय के लिए, इसकी उपयोगिता भी कई गुना ज्यादा होगी, बजाए कि एलिवेटेड कॉरिडोर के।
एक्सपर्ट ओपिनियन
इस एलिवेटेड रोड का बारीकी से अध्ययन करने वाले इंजीनियर अतुल सेठ का कहना है कि शंकर लालवानी के चुनाव के समय नितिन गडकरी शहर में थे, उन्हें ट्रैफिक की समस्या बताई गई तो उन्होंने सुझाव मांगे। तत्कालिक सुझाव के रूप में इस एलिवेटेड रोड को उन्होंने मंजूरी दे दी। 350 करोड़ की मंजूरी भी दे दी। राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। सज्जन सिंह वर्मा ने गडकरी से इस सड़क के लिए फंड मंजूर करा लिया और श्रेय लेने के चक्कर में बिना प्लानिंग के इसके टेंडर करा दिए। पीडब्ल्यूडी ने इसका काम भी शुरू कर दिया। आपत्तियों के बाद भी मामूली परिवर्तन के बाद इसे मंजूरी दी गई है, समस्या जस की तस रहने वाली है। पूरे एबी रोड का वास्तविक सर्वे होकर हर चौराहे की प्लानिंग अलग-अलग पुल के रूप में होना चाहिए तो ही इंदौर को पैसे का पूरा सदुपयोग प्राप्त होगा।
