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Electoral History: कांग्रेस से लगातार विदा हो रहे नेता, मप्र में 60 साल पुराना है यह सिलसिला

Tue, 12 Mar 2024 07:35 AM IST
दिनेश शर्मा कमलेश सेन
कमलेश सेन Published by: दिनेश शर्मा Updated Tue, 12 Mar 2024 07:35 AM IST
सार

लोकसभा चुनाव की आहट आरंभ होने के साथ ही प्रदेश में कांग्रेस छोड़कर जाने वालों का सिलसिला थम ही नहीं रहा है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का पार्टी की अंदरूनी हालातों पर ध्यान ही नहीं है। पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष व्याप्त है। 

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Electoral History: Leaders are continuously leaving Congress, this trend is 60 years old in Madhya Pradesh.
कांग्रेस छोड़ने वालों का सिलसिला बहुत पहले से जारी है। - फोटो : फाइल फोटो
लोकसभा चुनाव की आहट आरंभ होने के साथ ही प्रदेश में कांग्रेस छोड़कर जाने वालों का सिलसिला थम ही नहीं रहा है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का पार्टी की अंदरूनी हालातों पर ध्यान ही नहीं है। पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष व्याप्त है। मार्च 2020 में कांग्रेस के 22 विधायकों ने एक साथ पार्टी को छोड़ कमलनाथ सरकार को संकट में डाल दिया था। कमलनाथ को अल्पमत में आने के कारण पद छोड़ना पड़ा था। पार्टी ने कभी इस बात पर मंथन नहीं किया कि आखिर क्या वजह है कि पार्टी के पुराने और कद्दावर नेता पार्टी छोड़ रहे हैं? 


पिछले दिनों कांग्रेस के नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, पूर्व विधायक संजय शुक्ला, विशाल पटेल और पूर्व सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी ने कांग्रेस का सालों पुराना साथ छोड़ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया।  भाजपा में शामिल होने के साथ ही उन्होंने कई कारण बताए जिस वजह से वे कांग्रेस छोड़ रहे थे। अभी खबरें ये भी आ रही हैं कि प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी, जो नाराजगी के चलते कांग्रेस में चले गए थे, उनका भी मोह भंग  हो रहा है और वे पुनः घर वापसी के साथ भाजपा में आने के लिए तैयार हैं। पिछले दिनों पूर्वं मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ और उनके बेटे के भाजपा में जाने की खबरें लगातार चलती रहीं। 
 
Electoral History: Leaders are continuously leaving Congress, this trend is 60 years old in Madhya Pradesh.
गोविंदनारायण सिंह और भवगत राव मंडलोई - फोटो : फाइल फोटो
कहावतें कभी गलत नहीं होती है यह एक सार्वभौमिक सत्य है,'पक्षी फलदार पेड़ों पर ही बैठते हैं'। इस कहावत के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। कांग्रेस अब एक ऐसा संगठन हो गया है, जिसकी तुलना सूखे पेड़ जैसी हो गई है। न सत्ता, न प्रभावशाली नेतृत्व और पार्टी का लगातार घटता जनाधार और आपसी गुटबाजी, लगातार स्थानीय नेताओं की अपेक्षा कांग्रेस के कमजोर होने के कारण हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रदेश में  कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का संकट खड़ा न हो जाए।  

1962 में मुश्किल से बहुमत मिला था
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का प्रदेश में राजनीतिक प्रभाव 1952-1957 के चुनाव में जबर्दस्त था, लेकिन उसकी नींव कमजोर होने का सिलसिला 1962 के आम चुनाव से हो गया था। प्रदेश में कांग्रेस को बड़ी मुश्किल से बहुमत हासिल हुआ था। भगवंत राव मंडलोई प्रदेश के मुख्यमंत्री बने पर कामराज योजना के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। 1963 में पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा मुख्यमंत्री बनाए गए। मिश्रा ने 33 विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर लिया और अपनी स्थिति मजबूत बना ली थी। 
1962 के चुनाव में जिनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा वे ही जावरा से चुनाव में पराजित हो गए थे। डॉ. कैलाश नाथ काटजू जावरा से जनसंघ के लक्ष्मीनाराय पांडेय से चुनाव में हार गए थे। स्थानीय कांग्रेस नेताओं द्वारा काटजू की उपेक्षा से उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। इस पराजय से पंडित नेहरू काफी नाराज हुए थे।

 
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पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र और खूबचंद बघेल - फोटो : फाइल फोटो
1967 में दो फाड़ हो गई थी कांग्रेस
पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र प्रदेश के राजनीति में काफी प्रभावशाली नेता हो गए थे। 1967 के आम चुनाव में उन्होंने उम्मीदवारी के लिए आवेदन न देने वाले प्रदेश के नेताओं को टिकट नहीं दिए। इनमें प्रमुख नेता डॉक्टर कैलाशनाथ काटजू, भगवंतराव मंडलोई,  तख्तमल जैन और विजयाराजे सिंधिया प्रमुख थे। टिकट वितरण की इस गड़बड़ी ने कांग्रेस में दो फाड़ कर दिए थे। कांग्रेस से असंतुष्ट नेताओं ने जन कांग्रेस अलग दल बना लिया था। उस वक्त कांग्रेस से राज्यसभा सांसद खूबचंद बघेल जो पूर्व में प्रजा समाजवादी दल  के नेता थे, वे मिश्र के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए थे। बाद में बघेल कांग्रेस से इस्तीफा देकर जन-कांग्रेस में शामिल हो गए थे। एम.एल.जमनिक समाजवादी नेता थे और 1964 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। दमोह और मुरैना से कई कांग्रेस के कार्यकर्ता कांग्रेस छोड़ जन-कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। उन्होंने कांग्रेस ने नेतृत्व पर आरोप लगाया था कि उन्हें परेशान किया जा रहा है।  

कांग्रेस के प्रति असंतोष से बनी थी संविद सरकार
प्रदेश में पहली गैर कांग्रेसी संविद सरकार कांग्रेस के प्रति असंतोष की वजह थी। 1967 में पंडित मिश्र की सरकार को अल्पमत होने के संकट से बचाने के लिए जुलाई 1967 में आठ विधायकों को कांग्रेस में शामिल करने की अनुमति अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने दी थी। इस तरह आज यदि प्रदेश में दलबदल हो रहा है और कांग्रेस छोड़ कर वरिष्ठ नेता भाजपा में सम्मिलित हो रहे हैं तो यह कोई  नई बात नहीं है। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में सत्ता को बचाने के लिए दलबदल और गुटबाजी का श्रीगणेश 1962 से आरंभ हो गया था। अपने साथियों और कद्दावर नेताओं की उपेक्षा कांग्रेस ने 60 साल पहले से आरंभ कर दी थी। दलबदल और पाला बदलने का खेल जो कांग्रेस ने आरंभ किया वह ही उसे अब भारी पड़ रहा है। सत्ता और पद के प्रति आकर्षण होना एक सामान्य सिद्धांत है। चुनाव के करीब आते-आते और भी कई राजनेता कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा में शामिल हो सकते हैं।
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