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Azadi ka Amrit Mahotsav: ये है 'बुंदेलखंड का जलियांवाला बाग', यहां देशभक्तों ने खाई थी अंग्रेजों की गोलियां

Mon, 15 Aug 2022 09:59 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Mon, 15 Aug 2022 09:59 AM IST
सार

Azadi ka Amrit Mahotsav: ये है 'बुंदेलखंड का जलियांवाला बाग', यहां देशभक्तों ने खाई थी अंग्रेजों की गोलियां

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Azadi ka Amrit Mahotsav: This is 'Jallianwala Bagh of Bundelkhand', here patriots had eaten British bullets
चरणपादुका में बना बलिदान स्थल - फोटो : अमर उजाला
छतरपुर जिले के सिंहपुर गांव का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। कहा जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम यहां से गुजरे थे। उर्मिला नदी के बीच स्थित एक पत्थर में भगवान राम के पैरों को निशान मौजूद हैं, जिसके चलते इस जगह को चरणपादुका के नाम से जाना जाता है। वहीं, अगर इस जगह के इतिहास की बात करें तो ये भूमि बलिदानियों की है, जो आज भी उनका गौरव गान सुनाती है। 


बुंदेलखंड का जलियांवाला बाग
पंजाब के अमृतसर की ही तरह छतरपुर का सिंहपुर गांव भी एक जलियांवाला बाग का गवाह है। ब्रिटिश सैनिकों ने यहां भी आजादी के मतवालों को गोलियों से भूनकर मौत की नींद सुला दिया था। कहा जाता है असहयोग आंदोलन के समय यहां भी लोग विदेशी वस्त्रों की होली जला रहे थे। यहां किसी का नेतृत्व न होने के चलते गांव वाले खुद एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया करते थे। विदेशी वस्तुओं के त्याग करने की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के लिए क्रांतिकारियों ने सभा का निर्णय लिया था। सभा के लिए नौगांव ब्रिटिश छावनी में पदस्थ कर्नल फिशर से अनुमति मांगी गई, लेकिन कर्नल ने अनुमति नहीं दी। जिसके बाद ग्रामीणों ने मकर संक्राति के अवसर पर लगने वाले मेले में लोगों से आंदोलन में सहयोग देने की अपील करने के लिए मिलने का निर्णय किया।
Azadi ka Amrit Mahotsav: This is 'Jallianwala Bagh of Bundelkhand', here patriots had eaten British bullets
कर्नल के आदेश पर ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर गोलियों की बौछार कर दी। - फोटो : अमर उजाला
भगवान राम के गुजरने की वजह से इस स्थान पर हर साल मकर संक्रांति का मेला लगता था। 14 जनवरी, 1931 के दिन भी यहां मेला लगा था, जिसमें दूर-दूर के गांवों के लोग मेले में पहुंचे थे। इसी दौरान स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों ने लोगों को समझाना शुरू किया कि अंग्रेज किस तरह हमारे देश को लूट रहे हैं और हम पर ही राज कर रहे हैं। क्रांतिकारियों की बात सुनकर जनसमुदाय में अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश पनपने लगा और सभा में मौजूद लोगों ने एकजुट होकर घोषणा की कि वे अब अंग्रेजों को लगान नहीं देंगे। इसकी सूचना कर्नल फिशर को लगी, वह सैन्य बल के साथ मेला स्थल पहुंचा और ब्रिटिश सैनिकों ने चरणपादुका स्थल को चारों ओर से घेर लिया फिर कर्नल फिशर ने बिना चेतावनी दिए गोली चलाने का आदेश दे दिया।
Azadi ka Amrit Mahotsav: This is 'Jallianwala Bagh of Bundelkhand', here patriots had eaten British bullets
14 जनवरी 1931 में शहीद हुए लोगों के नाम। - फोटो : अमर उजाला
क्रूर कर्नल के आदेश पर ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर गोलियों की बौछार कर दी। लोग बदहवास होकर भागते रहे और गोलियां उन्हें निशाना बनाती रहीं। महिलाएं अपने बच्चों को लेकर नदी में कूद पड़ीं और डूबकर बच्चों सहित मारी गईं, इतनी लाशें गिरीं कि नदी का पानी लाल हो गया था। सरकारी आंकड़ों में सिर्फ 21 लोगों की मौत दर्ज हुई और 26 लोग गंभीर घायल बताए गए, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार यहां करीब 150 से अधिक लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे।

15 अगस्त, 1947 को देश के आजाद होने के बाद ग्रामीणों ने मिलकर चरणपादुका बलिदान स्थल पर एक स्मारक बनाया, जहां बाद में लगे एक सरकारी बोर्ड पर आज भी बलिदानी देशभक्तों के नाम अंकित हैं। यहां आज भी प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर मेला लगता है और लोग दूर-दूर से आकर बलिदानियों को याद करते हैं व उनकी स्मृति में दीप जलाते हैं।
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