शहीद भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के नाम से तो आज देश का बच्चा-बच्चा परिचित है लेकिन पाठ्यपुस्तकों से हमने सिर्फ यह ही जाना है कि अल्पायु में ही भारत माता के इन तीनों वीर सपूतों ने आजादी के खातिर बलिदान दिया था लेकिन सामान्य लोगों के ही तरह इनके जीवन का भी एक और पक्ष है जो कि बताता है कि क्रांतिकारी होने के अलावा भी यह जीवन में और किरदार निभा चुके थे। साथ ही इनमें से एक सदस्य ने तो अपने जीवन का एक हिस्सा छद्म नाम के साथ भी बिताया है। अगली स्लाइड्स से जानिए शहीद वीरों के जीवन और दोस्ती से जुड़ी अनसुनी बातें।
Shaheed Diwas 2021: वक्ता, शिक्षक और निशानेबाज की तिकड़ी ने मरते दम तक भी दोस्ती को रखा कायम, राजगुरु ही थे रघुनाथ
तीनों में थे अलग-अलग गुण
भगत सिंह अपने जीवन में क्रांतिकारी होने के साथ ही एक अच्छे वक्ता, पाठक व लेखक भी थे। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा व संपादन भी किया। वहीं सुखदेव भगतसिंह से मिलने से पहले शाम को गली- मोहल्ले में खेलने वाले वे बच्चे जिन्हें सब अस्पृश्य कहते थे, उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। राजगुरु के बारे में कहा जाता है कि वे एक बहुत अच्छे निशानेबाज हुआ करते थे।
राजगुरु ही थे रघुनाथ
राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था लेकिन राजगुरु के जीवन में एकसमय ऐसा भी था जब वे रघुनाथ के नाम से जाने जाते थे। राजगुरु चंद्रशेखर आजाद से बेहद प्रभावित थे इसलिए वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए थे। यहां उन्हें कोई भी राजगुरु के नाम से नहीं जानता था। वे यहां छद्म नाम रघुनाथ से पहचाने जाते थे।
मरते दम तक पेश की थी दोस्ती की मिसाल
23 मार्च 1931 को जब भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जा रही थी तो जेलर ने उनसे उनकी अंतिम इच्छा पूछी थी। तब भगत सिंह ने अपनी अंतिम इच्छा जाहिर कर दोस्ती की अलग ही मिसाल पेश की। उन्होंने जेलर से कहा कि उन तीनों के हाथ खोल दिए जाए ताकि वे गले मिल सकें। हाथ खोलने पर तीनों मित्र जी भर के गले लगे और उसके बाद हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए।
सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। लायलपुर के सनातन धर्म हाईस्कूल से मैट्रिक पास कर सुखदेव ने लाहौर के नेशनल कालेज में प्रवेश लिया। यहां पर सुखदेव की भगत सिंह से भेंट हुई। दोनों की विचारधारा बिल्कुल एक सी थी इसलिए जल्द ही दोनों के बीच बहुत गहरी दोस्ती हो गई। दोनों अक्सर देश की तत्कालीन समस्याओं पर लंबी-लंबी वार्तालाप किया करते थे। दोनों ही इतिहास के प्राध्यापक जयचंद्र के प्रिय छात्र थे।