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Savitribai Phule: लड़कियों की शिक्षा और समाज की कुरीतियों से ऐसे लड़ी थी सावित्रीबाई फुले, जानें कैसे हुई थी उनकी मृत्यु
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्रकाश चंद जोशी
Updated Wed, 10 Mar 2021 03:53 PM IST
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि Savitribai Phule
- फोटो : social media
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भारत में कई ऐसे आंदोलनकारी हुए, जिन्होंने समाज के सुधारों के लिए कई बड़े योगदान दिए। ऐसी ही एक शख्सियत थीं सावित्रीबाई फुले, जिनकी आज पुण्यतिथि है। उन्होंने हमेशा ही महिलाओं के अधिकारों, लड़कियों की शिक्षा, मानवीय संवेदनशीलता, महामारी से जूझने और कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई। वे हमेशा बिना डरे हर मुद्दे को आगे लेकर आईं, और उसके खिलाफ खुलकर अपनी बात रखीं। तो चलिए आज सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि के मौके पर आपको उनकी कुछ खास बातें बताते हैं।
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : istock
सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली फेमिनिस्ट आइकॉन भी कहा जाता है। साथ ही उन्हें भारत की पहली महिला शिक्षिका के तौर पर भी जाना जाता है, क्योंकि जब समाज सुधारक और उनके पति ज्योतिबाराव फुले ने पहला कन्या विद्यालय खोला, तब वहां पर सावित्रीबाई फुले ने अध्यापक की भूमिका अदा की थी। उन्होंने हमेशा ही लड़कियों के लिए शिक्षा को जरूरी बताया था।
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि savitribai phule
- फोटो : twitter
जातिवाद, पुरुष प्रधान समाज की व्यवस्था, भेदभाव, अत्याचार, बाल विवाह जैकी कुरीतियों के खिलाफ हमेशा ही सावित्रीबाई फुले ने अपनी आवाज बुलंद की। जहां एक तरफ उन्होंने शिक्षा और सामाजिक कामों के जरिए अपनी आवाज को उठाया, तो वहीं दूसरी तरफ इन मुद्दों पर कविताएं लिखकर भी खुद को कवयित्री भी स्थापित किया।
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि savitribai phule
- फोटो : social media
सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नौगांव में एक किसान परिवार में हुआ था। इसके बाद महज 10 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले की शादी 13 साल के ज्योतिबाराव से हो गई थी। हालांकि, उस वक्त दोनों का बाल विवाह हुआ था, लेकिन बाद में दोनों ने मिलकर बाल विवाह की कुरिति को खत्म करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। अपने पति ज्योतिबराव के साथ मिलकर उन्होंने पहले पहली कन्या शाला और फिर 18 अन्य बालिका स्कूल खोले थे।
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि savitribai phule
- फोटो : social media
अपना पूरा जीवन महिलाओं के लिए समर्पित करने वाली सावित्रीबाई फुले जब 66 साल की थी, तब उन्हें ब्यूबेनिक प्लेग महामारी ने अपना शिकार बनाया और इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें छीन लिया था। साल 1998 में भारत ने सावित्रीबाई के सम्मान में डाक टिकट जारी करके उन्हें श्रद्धांजलि दी थी, और आज भी उन्हें देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया एक महान महिला के तौर पर जानती है।
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