अंशु सिंह
यह जनरेशन अल्फा का समय है, जो एआई, स्मार्ट डिवाइस, ऑनलाइन लर्निंग एवं सोशल मीडिया के बीच पल-बढ़ रही है। यह पीढ़ी तकनीक के साथ जल्दी तालमेल बिठा लेती है और एप्स के साथ ही तरह-तरह के गैजेट्स का इस्तेमाल करने में भी अपने माता-पिता से कहीं आगे है। यूट्यूब, गेमिंग और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी इसकी पकड़ मजबूत हो चुकी है। वहीं अब तो जेन बीटा भी हमारे बीच है, जो टेक्नोलॉजी के विकास के साथ बड़ी होगी। यह सीखने और मनोरंजन के लिए एआई का प्रयोग करेगी।
लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है, दूसरा पहलू है कि जन्म से स्मार्टफोन, कंप्यूटर और अन्य गैजेट्स के संपर्क में रहने वाले ये बच्चे गाहे-बगाहे आपसे तकनीक से संबंधित सवाल पूछेंगे। जवाब न मिलने पर निराश होंगे। उत्तर न दे पाने के कारण आपको भी मलाल होगा। आप खुद को असहाय महसूस करेंगी और कई बार खुद को अपराधबोध से घिरा पाएंगी। लेकिन यह जमाना टेक्नॉलॉजी का है, इसलिए बच्चों का रोल मॉडल बनने के लिए आपको टेक्नॉलॉजी से जुड़ना होगा और बनना होगा ‘टेक्नो स्मार्ट मॉम’, जो कि बेहद आसान है।
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बच्चों को बनाएं अपना शिक्षक
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बच्चों को बनाएं अपना शिक्षक
आमतौर पर तकनीक में दक्ष व्यक्ति के लिए टेक्नोलॉजी या तकनीकी चीजों को समझना आसान होता है। वहीं एक गैर-तकनीकी व्यक्ति या उन महिलाओं के लिए थोड़ा मुश्किल होता है, जो इन चीजों में रुचि नहीं रखतीं। असल में, वे तकनीक के इस्तेमाल को लेकर डरती और घबराती हैं। उन्हें लगता है कि गलती होने पर वे मजाक की पात्र बन सकती हैं।
बाल मनोचिकित्सक रेणु गोयल कहती हैं, “आप मानें या न मानें, बच्चे आपसे हर प्रश्न के उत्तर की अपेक्षा नहीं करते। लेकिन जब वे किसी नए ऐप या टेक्नोलॉजी में रुचि दिखाते हैं तो उनसे पूछें कि वे इसके बारे में क्या जानते हैं या वे इसके साथ क्या करना चाहते हैं? यदि बच्चे बड़े हैं तो उन से अपने फोन पर ऐप डाउनलोड करने और उन्हें इसके सेटअप तथा उपयोग के बारे में बताने के लिए कहें। कई सर्वेक्षणों के अनुसार, 47 प्रतिशत माता-पिता और अभिभावकों को लगता है कि डिजिटल तकनीक के मामले में उनके बच्चे उन से ज्यादा जानकारी रखते हैं। इसलिए उनसे कुछ भी पूछने में संकोच न करें। बच्चों को लगना चाहिए कि आप सच में कुछ सीखना चाहती हैं। आमतौर पर बच्चे विशेषज्ञ बनकर माता-पिता को नई चीजें सीखना पसंद करते हैं।”
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निगरानी रखना आसान
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निगरानी रखना आसान
डिजिटल युग में तकनीक ने हमारे संवाद करने, काम करने और यहां तक कि बच्चों की परवरिश करने के तरीके को बदल दिया है। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना हानिकारक है, लेकिन कई ऐसे तरीके हैं, जहां तकनीक एक बेहतरीन टूल साबित हो सकती है।
आज तमाम एप्स एवं आधुनिक उपकरण मौजूद हैं, जिनसे आप बच्चों की मोबाइल डिवाइस, वीडियो गेम्स, सोशल मीडिया गतिविधियों, उनकी नींद एवं भोजन तक पर निगरानी रख सकती हैं। आप डिवाइस पर पेरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल कर उनके स्क्रीन टाइम को ठीक कर सकती हैं। इसके लिए आपको डिजिटल स्पेस को समझना होगा, यानी अगर मां टेक सेवी होगी, तो वह उन्हें ऑनलाइन सुरक्षा और साइबर बुलिंग जैसे अन्य खतरों के प्रति आगाह कर सकेगी। ध्यान रख सकेगी कि बच्चे तकनीक का सही इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं, खासकर तब, जब उन्हें स्मार्टफोन एवं वीडियो गेम्स की लत लगी हो।
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राह मुश्किल नहीं
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राह मुश्किल नहीं
कहते हैं कि कुछ करने की इच्छाशक्ति हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। पांच साल पहले क्या आपने कल्पना की थी कि सब्जी से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदने के लिए डिजिटल पेमेंट करेंगी? लेकिन आपने किया। कोविड के दौरान स्कूल-कॉलेज बंद होने पर जब क्लासेस ऑनलाइन हो गईं तो शिक्षकों के साथ-साथ घर में रहने वाली माताओं को भी कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
दिल्ली के हर्ष विहार की रहने वाली सौम्या को भी अंदाजा नहीं था कि वह दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे वंश को गूगल मीट पर होने वाली क्लासेस में कैसे जॉइन कराएंगी? क्योंकि न उन्हें गूगल मीट और न उसके प्रयोग की कोई जानकारी थी। उन्होंने परेशान होने के बजाय यूट्यूब के ट्यूटोरियल क्लासेस से जानकारी हासिल करने के अलावा स्कूल टीचर से भी मदद ली।
दिलचस्प बात रही कि वंश ने स्वयं पहल कर पूरी प्रक्रिया को समझा और वह बिना किसी बाधा के अपनी ऑनलाइन क्लास कर सका। ऐसे में अब यह कहना गलत नहीं होगा कि महामारी ने फोन, टैबलेट, लैपटॉप को जीवन की एक बुनियादी आवश्यकता बना दिया।
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सकारात्मक उपयोग
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सकारात्मक उपयोग
सोशल मीडिया पर बच्चे काफी सक्रिय रहते हैं। अध्ययन बताते हैं कि 9 से 17 साल की उम्र के भारतीय बच्चे रोजाना करीब तीन घंटे सोशल मीडिया एवं गेमिंग पर व्यतीत करते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया आपका भरोसेमंद साथी बन सकता है। आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे ग्रुप हैं, जहां पेरेंटिंग और तकनीक पर केंद्रित चर्चाएं होती हैं, कंटेंट साझा किए जाते हैं। आप भी देखने एवं परखने के बाद उन ग्रुप से जुड़ सकती हैं या जुड़ने का अनुरोध कर सकती हैं। उसके बाद उन समूहों में पोस्ट की गई सामग्री आपके न्यूज फीड में दिखाई देने लगेगी। इससे भी अच्छा होगा कि अपने आस-पास कोई समूह तलाशें, जो तकनीक से जुड़े मुद्दों पर बात एवं नियमित बैठक करता हो।
कहते हैं कि जो अच्छा लगता है, उसे सीखना हमेशा अच्छा होता है। तकनीक एक ऐसी चीज है, जो हर दिन, हर पल बदलती रहती है, लेकिन अपने आस-पास की तकनीक के बारे में बुनियादी जानकारी होना और अपनी जरूरतों को शामिल करना हमेशा काम आता है।