कंचन चौहान
भावनाएं जीवन को अर्थ और गहराई देती हैं। ये रिश्तों को मजबूत और मनुष्य को संवेदनशील इन्सान बनाती हैं। लेकिन जब भावनाएं आप पर हद से ज्यादा हावी हो जाती हैं तो वे आपकी कमजोरी बन सकती हैं। अक्सर लोग अत्यधिक भावुक व्यक्तियों का फायदा उठाते हैं और उन्हें अपराध-बोध का शिकार बना देते हैं। भावुक होना गलत नहीं है, लेकिन जरूरी है कि आप अपनी भावनाओं को समझदारी से संभालना सीखें। महिलाओं के लिए तो यह अधिक जरूरी है।
भावुकता कमजोरी क्यों?
इमोशनल होना अपने आपमें कोई बुरी बात नहीं है। भवनाएं तो इन्सान को दयालु और संवेदनशील बनाती हैं। लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि जब कोई व्यक्ति हर बात में ‘हां’ कहता है और अपनी सीमाएं भूल जाता है तो लोग उसका फायदा उठाने लगते हैं। बार-बार दूसरों की उम्मीदें पूरी करते-करते वह खुद को थका देता है और धीरे-धीरे आत्मसम्मान खो बैठता है। महिलाओं के साथ ऐसा ज्यादा होता है, क्योंकि वह पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भावुक होती हैं।
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न कहना जरूरी
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‘न’ कहना जरूरी?
हमारे समाज में अक्सर ‘न’ कहना अपमान समझा जाता है, लेकिन वास्तव में यह आत्मसुरक्षा का तरीका है। हर किसी की मदद करना संभव नहीं होता और न ही यह जरूरी है। जब आप सही जगह पर ‘न’ कहना सीख जाएंगी तो लोग आपका फायदा उठना छोड़ देंगे। याद रखें, ‘न’ कहने का मतलब स्वार्थी होना नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं और क्षमताओं को समझना है।
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समझदारी से संभालें
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समझदारी से संभालें ?
भावुक होना आपको एक बेहतर इन्सान बनाता है, लेकिन भावनाओं में बहकर निर्णय लेना कई बार नुकसानदायक साबित होता है। इसलिए जरूरी है कि दिल के साथ-साथ दिमाग को भी संतुलन में रखा जाए। किसी भी फैसले से पहले कुछ पल रुककर सोचें और हर मदद की गुहार पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें। जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सलाह लेना समझदारी होती है। आत्मचिंतन करें कि आप मदद सही कारण से कर रही हैं या सिर्फ इसलिए कि आपको ‘न’ कहने में डर लगता है।
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सीमाएं तय करें
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सीमाएं तय करें?
सीमाएं तय करना आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप असंवेदनशील हैं, बल्कि यह दर्शाता है कि आप अपने और दूसरों के बीच संतुलन बनाए रखना जानती हैं। जब आप स्पष्ट करती हैं कि किन परिस्थितियों में कितना सहयोग दे सकती हैं तो लोग आपकी भावनाओं और समय की कद्र करने लगते हैं। अपनी सीमाओं का सम्मान करना आत्मदेखभाल का हिस्सा है, जो स्वस्थ रिश्तों के लिए जरूरी है।
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बुरा महसूस न करें?
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बुरा महसूस न करें?
यह स्वीकार करना जरूरी है कि आप हर समय हर किसी के लिए उपलब्ध नहीं रह सकतीं। कभी-कभी अपनों को अपनी परिस्थितियों से खुद ही निपटना होता है। हर बार मदद न कर पाने पर बुरा महसूस करना स्वाभाविक है, लेकिन यह आत्मग्लानि नहीं, समझदारी का संकेत है। इसलिए अपनी भावनाओं को निंयत्रित करना सीखें, तभी आप रिश्तों को दिल से निभा पाएंगी।
इमोशनल इंटेलिजेंस विकसित करें
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. हेमा खन्ना बताती हैं, जब आप भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं, तो लोग आसानी से आपका फायदा उठा सकते हैं, क्योंकि आपको सीमाएं तय करने या ‘न’ कहने में कठिनाई होती है। इस कमजोरी के चलते दूसरे लोग आपकी भावनाओं से खेल सकते हैं, जैसे- अपराध-बोध, सहानुभूति या दबाव डालकर अपना स्वार्थ साध सकते हैं। इससे आप रिश्तों में शोषित महसूस करती हैं। इसलिए इमोशनल इंटेलिजेंस विकसित करना जरूरी है। यह आपको आत्मनियंत्रण, सहानुभूति और सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना सिखाता है। इससे आप तनावपूर्ण स्थितियों को बेहतर ढंग से संभालती हैं, जिससे रिश्ते मजबूत होते हैं।