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लॉकडाउन जीवनशैली: एकांत में रहने वाले संन्यासी से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं

Fri, 01 May 2020 09:13 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Fri, 01 May 2020 09:13 AM IST
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Lifestyle in Lockdown: what we should learn from hermit or saints Monk teaches us solitary life
विकासवादी जीव विज्ञान हमें सिखाता है कि हम सामाजिक प्राणी हैं

आप लंबे समय से अकेले हैं? अपना काम खुद कर रहे हैं? आपके बेतरतीब बालों को सैलून की जरूरत पड़ गई है? लॉकडाउन में या आइसोलेशन में रह रहे लोग अपनी तुलना संन्यासियों के जीवन से कर सकते हैं। कोविड-19 वैश्विक महामारी में मोबाइल और इंटरनेट ने संपर्क के तमाम रास्ते मुहैया करा रखे हैं, फिर भी हमारे घरों में पहाड़ पर बनी कुटिया जैसे एकांत का अहसास हो सकता है।



बेशक एक बड़ा अंतर मौजूद है। लॉकडाउन किया गया है, जबकि संन्यासियों ने खुद अपने लिए एकांत का जीवन चुना था। विकासवादी जीव विज्ञान हमें सिखाता है कि हम सामाजिक प्राणी हैं। जिंदा रहने और आगे बढ़ने के लिए हम रिश्ते और समुदाय बनाना जानते हैं। ऐतिहासिक सबूत हैं कि इंसान में दूसरी आकांक्षा भी मौजूद रही है जो एकाकी जीवन की ओर ले जाती है। हम वास्तविक और काल्पनिक दोनों तरह के संन्यासियों के आकर्षण में बंधे रहते हैं। कवयित्री एमिली डिकिन्सन, अरबपति हॉवर्ड ह्यूग्स और डॉ. स्यूस ग्रिंच इसके उदाहरण हैं।

Lifestyle in Lockdown: what we should learn from hermit or saints Monk teaches us solitary life
संन्यासी (प्रतीकात्मक तस्वीर)

रेगिस्तान के संन्यासी
18वीं सदी के ब्रिटेन में, जमींदारों ने कुछ छोटे मंदिर बनवाए थे जहां पैसे देकर कुछ लोगों को भिक्षुओं के वेष में रखा जाता था। अंग्रेजी का hermit शब्द 12वीं सदी का है। यह ग्रीक शब्द erēmia से निकला है जिसका अर्थ होता है रेगिस्तान। इस अर्थ से इसकी धार्मिक पृष्ठभूमि का पता चलता है। पॉल ऑफ थेब्स को पहला ईसाई संन्यासी माना जाता है। वह 13 साल की उम्र में एक उत्पीड़न केंद्र से भाग निकले थे। मिस्र के रेगिस्तान में वह 100 साल तक एकांत में रहे। 314 ईस्वी में 113 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।

पॉल ऑफ थेब्स एक गुफा में रहते थे। माना जाता है कि एक कौआ उनके लिए रोटी लाता था। खजूर के पत्तों से वह अपना शरीर ढंकते थे। उनके आखिरी दिनों में डेजर्ट फादर्स मूवमेंट शुरू करने वाले भिक्षु एंथनी दि ग्रेट उनसे मिले थे। एंथनी ने हजारों लोगों को भिक्षुओं का जीवन जीने के लिए प्रेरित किया था। दूसरे धर्मों के अपने संन्यासी हैं। हिंदू दार्शनिकों, ताओवादी कवियों और यहूदी रहस्यवादियों को समाज से दूर रहकर अपने विश्वास के प्रति पूरी तरह समर्पित होने के लिए जाना जाता है।

Lifestyle in Lockdown: what we should learn from hermit or saints Monk teaches us solitary life
चौथी और पांचवी सदी में पवित्र महिलाएं मठों में रहती थीं

महिला संन्यासी भी हुई हैं। मिस्र की सेंट मैरी शारीरिक भूखों के प्रायश्चित के लिए नितांत एकांत में रहती थीं। चौथी और पांचवी सदी में पवित्र महिलाएं मठों में रहती थीं। फिर भी संन्यासियों के बारे में हमारे मन में बनी छवियां लैंगिंक धारणाओं से अछूती नहीं रहीं। बौद्ध धर्म की प्रारंभिक महिला भिक्षुणियां संघ में अपवाद की तरह होती थीं। टैरो कार्ड की गड्डी के हर्मिट कार्ड की तरह उनकी तस्वीर पुरुष के रूप में बनाई जाती है। 

साहित्य में जो महिलाएं एकांत का जीवन चुनती हैं उनको अक्सर दया की पात्र या बदनीयत दिखाया जाता है। चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यास की पात्र मिस हविशम या चार्लोट ब्रोंटे की "मैडवूमेन इन दि एटिक" की तुलना डेनियल डेफो की 'रॉबिन्सन क्रूसो' से करके देखें।

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क्रूसो ने कभी खुद को अकेला महसूस नहीं किया (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एकांत का समय नहीं
क्रूसो ने खुद से एकांत नहीं चुना, फिर भी वह इसके मिसाल बन गए। कैरेबियाई द्वीप पर फंसे होने के दौरान उन्होंने विश्वास करना सीखा। दिल तोड़ने वाली घटनाओं के बावजूद उन्होंने कभी खुद को अकेला महसूस नहीं किया। क्रूसो ने हमेशा खुद को व्यस्त रखा। वह अपना घर बनाने में लगे रहे, फसल उगाते रहे और जंगली बकरियों को पालतू बनाने में व्यस्त रहे।

डेफो के उपन्यास के दिग्गज पात्र को एक और फायदा था। उनके बारे में तब लिखा गया था जब हम अकेलेपन की आज की अवधारणा को नहीं जानते थे। वास्तव में, अकेलेपन का जिक्र अंग्रेजी साहित्य में 1800 ईस्वी से पहले शायद ही कभी दिखता है। इसकी एक वजह तंग जीवनशैली है जिसमें लोगों को जाने के लिए मजबूर किया गया। आज जिस तरह कई लोग अकेले जीवन गुजारते हैं, ऐसा उन दिनों नहीं सुना जाता था।

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खुद में रहना वास्तव में शांति दे सकता है

अकेले रहना एकाकीपन का पर्याय नहीं है। अगर हम दोनों शब्दों में भ्रमित होते हैं तो शायद इसलिए कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें किसी को अकेला छोड़ देना सजा के तौर पर देखा जाता है। फिर भी भीड़-भाड़ वाली पार्टी में अनजान चेहरों के बीच फंसे लोग जानते हैं कि अकेला महसूस करना और अकेला होने में अंतर है।

खुद में रहना वास्तव में शांति दे सकता है। किशोरों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि जब वे अकेले रहते हैं तो खुद के बारे में बेफिक्र रहते हैं। अपने साथ समय बिताएंगे तो खुद को जानेंगे कि आप कौन हैं। समाज के बारे में संन्यासी चाहे जितने असंतुष्ट हों, लेकिन वे खुद से संतुष्ट होते हैं। जैसा कि अमेरिकी दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो ने माना है, "मुझे कभी भी ऐसा साथी नहीं मिला जो एकांत से बढ़िया हो।"

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