2 अक्टूबर 2019 को पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का जश्न मनाएगा। 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर में पैदा हुए मोहनदास करमचंद गांधी को पूरी दुनिया अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजती है। सादे जीवन, उच्च विचारों और प्रकृति के प्रति अपने प्रेम के चलते ही वो भारतीयों के बापू बन गए। उनका प्रकृति और मनुष्यों के प्रति प्रेम जग जाहिर है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गांधी जी का बताया अहिंसा का मार्ग है। गांधी जी प्रकृति से प्रेम करते थे और उसे मानने वाले शख्स थे। इसकी शुरुआत गांधी जी के पठन-पाठन के दिनों से ही चली आ रहीं थी। तो आइए जानें कैसे हमारे बापू का प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति प्रेम बढ़ा और उन्होंने इसका प्रसार किया।
Gandhi jayanti 2019:गांधी जी को था प्राकृतिक चिकित्सा पर भरोसा और देते थे सात्विक भोजन की सलाह
महात्मा गांधी जब अफ्रीका में थे तब वह कब्ज से बहुत पीड़ित रहते थे। इसके लिए उन्होंने बहुत सारी दवाओं का भी सहारा लिया लेकिन कोई भी फायदा नहीं हुआ। तब उनके एक अंग्रेज मित्र जो कि अफ्रीका में ही रहते थे, उनसे सलाह ली। तो उस मित्र ने गांधी जी को प्राकृतिक चिकित्सा के जनक लुई कूने की पुस्तक 'द न्यू साइंस ऑफ हीलिंग' और जुस्ट की पुस्तक 'रिटर्न टू नेचर' को पढ़ने का सुझाव दिया। इन पुस्तकों को पढ़ने का गांधी जी पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने पुस्तक में वर्णित प्राकृतिक चिकित्सा की विधियां जैसे ठंडा घर्षण, कटि स्नान, मेहन स्नान और पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी आदि के प्रयोग स्वयं पर करने का अभ्यास किया। इन उपचार के सकारात्मक प्रभाव का असर था कि वो सबको प्राकृतिक चिकित्सा की सलाह देने लगे।
गांधी जी योग और प्राकृतिक चिकित्सा पर बहुत भरोसा करते थे। वो अपने आहार में भी इस बात का बहुत ध्यान रखते थे कि उनका आहार शुद्ध और सात्विक हो। इसके लिए वे बिना मिलावटी वाले कुदरती स्वाद और गुणों को बरकरार रखने वाले आहार को पसंद करते थे। दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स फॉर्म का प्रयोग उस पद्धति का ही नतीजा था जिसे आज ऑर्गेनिक खेती का नाम दिया जा रहा है। गांधी जी भारत में प्राकृतिक चिकित्सा की शुरुआत करने वाले शख्स हैं।
आज से सौ साल पहले ही गांधी जी ने भोजन के इन गुणों से प्रभावित होकर अपने अनुयायियों को खाने की सलाह दी थी जो आज के युग में छोटे किसानों की आजीविका के लिए बहुत जरूरी है। कंद, मूल, फल को श्रेष्ठ समझने वाले बापू का आहार आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरा है। अपने स्वास्थ्य को लेकर सलाह लेने वालों को वो इसे अपनाने की सलाह देते थे और जिसने भी प्राकृतिक चिकित्सा का अनुसरण किया उसे फायदा ही हुआ।
गांधी जी कहते थे कि शरीर में स्वयं ऐसे गुण हैं कि वह अपनी सफाई कर ले, इसलिए जब हम बीमार होते हैं तो शरीर अपनी स्वच्छता की क्रिया शुरू कर देता है। गांधी जी आगे बताते हैं कि मैं प्रकृति के उपचार और उपवास पर भरोसा करता हूं। हाइड्रोपैथी और एनिमा प्राकृतिक उपचार है, इसलिए वो हमेशा फलों के जूस को प्राथमिकता देते थे, विशेषतौर पर संतरे के जूस को।