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Mental Health Day: अक्सर बनी रहती है चिंता-घबराहट? जानिए मानसिक समस्याएं शरीर को किस तरह से करती हैं प्रभावित

Mon, 10 Oct 2022 12:04 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 10 Oct 2022 12:04 AM IST
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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम - फोटो : Pixabay

मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के मामले पिछले कुछ वर्षों में काफी तेजी से बढ़ते हुए देखे जा रहे हैं। डॉक्टर्स कहते हैं, विशेषकर कोरोना महामारी के बाद से यह जोखिम और भी तेजी से बढ़ा है। अध्ययनों में पाया गया है कि कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न नकारात्मक स्थितियों ने मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। क्या आपको भी अक्सर  चिंता-घबराहट और तनाव की समस्या बनी रहती है? अगर हां तो सावधान हो जाएं, यह मानसिक स्वास्थ्य विकारों की तरफ संकेत है जिसपर शीघ्रता से ध्यान देते हुए उपचार की आवश्यकता होती है।



वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रही मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने और इस बारे में लोगों को जागरूक और शिक्षित करने के उद्देश्य से हर साल 10 अक्तूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। मनोरोग विशेषज्ञ कहते हैं, चिंता-घबराहट की समस्याओं पर पहले तो गंभीरता से ध्यान न देना नुकसानदायक है, इसके अलावा अक्सर लोग इन विकारों के निदान में भी गलती कर देते हैं।

ज्यादातर मामलों में इसे ब्लड प्रेशर की समस्या मानकर इलाज किया जाता है, हालांकि असल में चिंता-घबराहट के कारण भी ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि चिंता-घबराहट की लंबे समय तक बनी रहनी वाली समस्या सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं, शारीरिक रूप से कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। आइए इस बारे में आगे विस्तार से समझते हैं।

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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के दुष्प्रभाव - फोटो : istock

चिंता-तनाव के कारण हृदय रोगों की समस्या

चिंता-तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का बने रहना आपमें समय के साथ गंभीर हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ाने वाली हो सकती है। अध्ययन में पाया गया है कि तनाव की स्थिति शरीर में इंफ्लामेशन को बढ़ा देती है, जो उन कारकों से जुड़ा होता है जिससे हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि चिंता-तनाव के कारण उत्पन्न इंफ्लामेशन के कारण हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने का भी खतरा होता है। तनाव की स्थिति को हृदय गति बढ़ने (टैचीकार्डिया) का भी कारक माना गया है जिसके कारण गंभीर हृदय रोगों का जोखिम जैसे हार्ट अटैक-स्ट्रोक हो सकता है।

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टाइप-2 डायबिटीज का खतरा - फोटो : istock

डायबिटीज की समस्या

अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि चिंता-तनाव की स्थिति हृदय रोगों के साथ डायबिटीज के खतरे को भी बढ़ाने वाली हो सकती है। शोधकर्ताओं ने तनाव और टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम के बीच संबंध पाया है। तनाव की स्थिति बढ़ने के कारण उत्पन्न हार्मोन्स अग्न्याशय में इंसुलिन-उत्पादक कोशिकाओं की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं जिसके कारण ब्लड शुगर बढ़ने का जोखिम रहता है।

तनाव की स्थिति में उत्पन्न हार्मोन कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन के रक्तप्रवाह में मिलने से सांस की गति बढ़ जाती है। इसका मेटाबॉलिज्म पर भी नकारात्मक असर देखा गया है।

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मोटापे का बढ़ता खतरा - फोटो : iStock

वजन बढ़ने-मोटापे का जोखिम

तनाव की समस्या को मोटापे से जोड़कर भी देखा गया है। तनाव में उत्पन्न कोर्टिसोल हार्मोन मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, जिसका शरीर पर कई प्रकार से नकारात्मक असर देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, कोर्टिसोल का स्तर बढ़ना मीठे, वसायुक्त और नमकीन खाद्य पदार्थों के खाने की इच्छा को भी बढ़ाने वाला माना जाता है जिसके कारण भी वजन तेजी से बढ़ने का जोखिम होता है। वजन बढ़ना कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।

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मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को कैसे कम करें? - फोटो : Pixabay

तनाव-चिंता को करें कंट्रोल

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिस तरह से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ता जा रहा है ऐसे में जरूरी हो गया है कि सभी उम्र के लोग तनाव-चिंता को नियंत्रित करने वाले उपाय करते रहें। इसके लिए दिनचर्या में कुछ बातों का विशेष रखा जाना आवश्यक हो जाता है।

  • शारीरिक गतिविधि में कमी को तनाव बढ़ाने वाला कारक माना जाता है, ऐसे में शारीरिक रूप से सक्रियता बनाए रखें।
  • मन को शांति देने वाले अभ्यास जैसे मेडिटेशन और डीप्र ब्रीदिंग योग करने से लाभ मिलता है। 
  • सकारात्मक विचार वाले लोगों से मिले, दोस्तों के साथ खूब हसें। 
  • पर्याप्त नींद लेना सभी आयु के लोगों के लिए अति आवश्यक माना जाता है।
  • सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइम को कम करें, लोगों से व्यक्तिगत तौर पर मिलना बढ़ाएं।
  • तनाव-चिंता जैसी समस्या बनी रहती है तो इस बारे में समय से मनोरोग विशेषज्ञ से मिलकर सलाह और इलाज प्राप्त करें। 




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
 

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