हमारे शरीर में कई ऐसे काम हैं जो निरंतर चलते रहते हैं पर आमतौर पर उस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। सांस लेना भी ऐसी ही प्रक्रिया है, जो निरंतर चलती रहती है। ये शरीर का सबसे सामान्य काम लगता है, लेकिन यही काम जब मुश्किल होने लगे तो जिंदगी की रफ्तार बदल सकती है। हम बात कर रहे हैं फेफड़ों की बढ़ती बीमारियों की। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) और फोरम ऑप इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटीज जैसे संगठनों के डेटा के अनुसार, दुनियाभर में सांस और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से हर साल 80 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है।
फेफड़ा दिवस: दुनिया में हर छठी मौत का कारण हैं फेफड़ों की बीमारियां, कहीं आप भी न हो जाएं शिकार?
फेफड़ों की बीमारियां दुनिया में मौत का बड़ा कारण हैं। अस्थमा, सीओपीडी, निमोनिया, फेफड़ों का कैंसर और टीबी को फेफड़ों की ‘बिग फाइव’ बीमारियां माना जाता है। धूम्रपान, प्रदूषण, घर का धुआं और कार्यस्थल पर धूल-रसायनों का संपर्क इनके खतरे को बढ़ा सकता है।
फेफड़ों की बढ़ती बीमारियां
अमर उजाला से बातचीत में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ गौरव चतुर्वेदी बताते हैं, फेफड़ों की बीमारियों के लिए सिर्फ धूम्रपान ही जिम्मेदार नहीं है। चूल्हे का धुआं, प्रदूषण और जहरीली हवा के साथ काम की जगह पर उड़ने वाली धूल-रसायन भी धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
- अस्थमा से लेकर सीओपीडी, निमोनिया, फेफड़ों के कैंसर और टीबी तक कई बीमारियां सांस लेने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।
- इनमें कुछ बीमारियां लंबे समय तक शरीर में बनी रहती हैं, जबकि कुछ संक्रमण तेजी से गंभीर हो सकते हैं।
आइए फेफड़ों की बीमारियों के 'बिग-फाइब' के बारे में जान लेते हैं जिसके कारण सबसे ज्यादा लोगों की जान जा रही होती है।
फेफड़ों की ‘बिग फाइव’ बीमारियां
इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटीज ने फेफड़ों की पांच ऐसी बड़ी बीमारियों के बारे में बताया है, जो दुनियाभर में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों और मौत का सबसे बड़ा कारण मानी जाती हैं। इन्हें ‘बिग फाइव’ यानी फेफड़ों की पांच प्रमुख बीमारियां कहा जाता है।
अस्थमा
- अस्थमा फेफड़ों की क्रॉनिक बीमारी है, जिसमें सांस की नलियों में सूजन और संकुचन के कारण होती है, इससे सांस लेने में परेशानी हो सकती है। दुनिया में 35 करोड़ से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हैं। यह बीमारी बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही है।
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी
- सीओपीडी फेफड़ों की एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है। इसमें सांस की नलियों में रुकावट पैदा होती है और हवा का अंदर-बाहर जाना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण लगातार सांस फूलने और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। यह दुनिया में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है और हर साल 30 लाख से ज्यादा लोगों की मौत इससे होती है।
सांस की नली और फेफड़ों में होने वाले संक्रमण
- इनमें निमोनिया जैसी बीमारियां शामिल हैं। निमोनिया में फेफड़ों में संक्रमण हो जाता है और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। अकेले निमोनिया से हर साल 24 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है। इसका असर खास तौर पर छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा पड़ता है।
फेफड़ों का कैंसर
- फेफड़ों का कैंसर दुनिया में सबसे आम कैंसर में शामिल है और कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है। इससे हर साल करीब 18 लाख लोगों की जान जाती है।
ट्यूबरकुलोसिस
- ट्यूबरकुलोसि यानी टीबी हवा के जरिए फैलने वाला एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है। माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नाम के बैक्टीरिया फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। हर साल 1 करोड़ से ज्यादा लोग टीबी की चपेट में आते हैं, जबकि करीब 14 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
फेफड़ों की बीमारियों के बड़े खतरे
धूम्रपान
- सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पादों का धुआं फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। सिर्फ खुद धूम्रपान करना ही नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति के सिगरेट पीने से निकलने वाला धुआं यानी सेकेंड हैंड स्मोक भी आपके लिए उतना ही नुकसानदायक है। ये सीओपीडी, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा कारण माना जाता है।
वायु प्रदूषण
- घर के अंदर और बाहर दोनों तरह के प्रदूषण फेफड़ों के लिए खतरनाक हैं। लकड़ी, कोयला या दूसरे ठोस ईंधन से नुकलने वाला धुंआ हो या फिर घर के भीतर वेंटिलेशन की कमी, ये सभी फेफड़ों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाली समस्या बन सकते हैं। इसके अलावा गाड़ियों, कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण भी फेफड़ों को डैमेज करता है।
काम की जगह पर धूल और जहरीले रसायन
- कुछ लोगों को अपने रोजमर्रा के काम के दौरान लगातार धूल, सिलिका, धुआं और रसायनों के संपर्क में रहना पड़ता है। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से अस्थमा, सीओपीडी और न्यूमोकोनियोसिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। न्यूमोकोनियोसिस ऐसी बीमारी है जिसमें लंबे समय तक धूल के बारीक कण फेफड़ों में जमा होने से फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है।
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स्रोत:
The Global Impact of Respiratory Disease
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