दुनिया में 0.1 प्रतिशत से लेकर 1.4 प्रतिशत लोग एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (एएस) की बीमारी से पीड़ित हैं। मई माह के पहले शनिवार को वर्ल्ड एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस डे मनाया जाता है।इस बार यह चार मई को एएस-डे है। एएस एक इंफ्लेमेटरी और ऑटोइम्यून बीमारी है। यह मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। अगर किसी को यह बीमारी है तो उसकी कमर, पेल्विस और नितंबों में दर्द शुरु हो जाता है। वैसे यह बीमारी पूरे शरीर को ही प्रभावित कर सकती है। पूरी दुनिया में इसके मरीजों का प्रतिशत भले ही छोटा नजर आ रहा हो, लेकिन 100 में से लगभग एक वयस्क इस क्रॉनिक स्थिति से ग्रसित हैं।इस बीमारी में हड्डियां आपस में गुंथ जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप रीढ़ की हड्डी सख्त हो जाती हैं। शोध बताता है कि एएस की पहचान होने में आमतौर पर औसतन 7 से 10 साल लग जाते हैं।
World Ankylosing Spondylitis Day: रीढ़ की हड्डी सख्त है तो हो सकती है ये गंभीर बीमारी
इस बीमारी के शुरुआती चरण में, मरीज को अक्सर कमर दर्द की शिकायत रहती है। बहुत से लोग इसे सामान्य दर्द मानकर ईलाज नहीं कराते हैं। यही वजह है कि इस बीमारी की पहचान में देरी हो जाती है। मरीज दर्द निवारक गोलियां खाते रहते हैं। उन्हें यह मालूम ही नहीं होता कि वे एएस से ग्रसित हो चुके हैं। यदि आपको एएस होने का पता चलता है तो शुरु में रूमेटोलॉजिस्ट की मदद ली जा सकती है। इसमें एनएसएआईडी (नॉन स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेंटरी दवाएं) शामिल होती हैं। आगे जाकर रोग में सुधार वाली दवाएं या टीएनएफ ब्लॉकर्स जैसी बायोलॉजिक्स दे सकते हैं। इससे बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। उसके बाद हड्डियों के आपस में गुंथ जाने के समय को आगे बढ़ाया जा सकता है।
डॉ. सुशांत शिंदे, कंसल्टेंट फिजिशियन, क्वेस्ट क्लीनिक, मुंबई का कहना है, इस बीमारी में सबसे अहम चीज रूमेटोलॉजिस्ट की सलाह होती है। रूमेटोलॉजिस्ट ऐसा डॉक्टर है जो एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस से पीड़ित लोगों के इलाज के लिये विशेष रूप से प्रशिक्षित होता है। इसके लिए आज बायोलॉजिक्स थैरेपी जैसे इलाज के उन्नत विकल्प मौजूद हैं। नई दिल्ली में एम्स के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दानवीर भादू कहते हैं, एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस एक पुरानी और शरीर में कमजोरी लाने वाली बीमारी है। अलग-अलग कारणों से मरीजों को इसके बेहतर इलाज के विकल्प नहीं मिल पाते। बायोलॉजिक थेरेपी अपनाकर हम शरीर की संरचनात्मक प्रक्रिया में नुकसान को कम से कम कर सकते हैं। कई मरीज रीढ़ की हड्डी, घुटनों और जोड़ों में दर्द के इलाज के लिए अन्य तरीके अपनाने लगते हैं, जिससे लंबी अवधि बीतने के बाद भी मरीजों को रोग में कोई आराम नहीं पहुंचता। मरीजों में एलोपैथिक दवा के साइड इफेक्ट्स का डर और गैर-पारंपरिक दवाओं की शाखा जैसे होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक और यूनानी जैसी चिकित्सा विज्ञान की शाखाओं पर विश्वास अब भी बना है। वैकल्पिक दवाएं लेने से रीढ़ की हड्डी के बीच कोई दूसरी हड्डी पनपने का खतरा बना रहता है। इसके चलते वह हड्डी पूरी तरह सख्त हो जाती है और मरीज के व्हील चेयर पर आने का खतरा रहता है।
अगर ये सब करेंगे तो बच सकते हैं एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस से
व्यायाम
एएस में सुबह के समय कमर, पेल्विस तथा नितंबों का गंभीर रूप से सख्त हो जाना इसके आम लक्षणों में से एक हैं।इसे उपयुक्त व्यायाम के जरिये नियंत्रित किया जा सकता है।इसी तरह, नियमित व्यायाम करने की दिनचर्या से इस बीमारी को आगे बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है।पोश्चर को उचित रूप में रखा जा सकता है।अधिक कड़कपन की वजह से व्यायाम करने में मुश्किलें पेश आ रही हैं तो मरीज को यह सलाह दी जाती है कि वे कुछ वॉर्म अप एक्सरसाइज से शुरुआत कर सकते हैं।सुबह के समय ज्यादा दर्द है तो दोपहर के समय व्यायाम कर सकते हैं।साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि अपने वर्क डेस्क या सीट पर झुककर ना बैठें, इससे भी हड्डी में कड़कपन हो सकता है।पोश्चर बिगड़ने की संभावना भी बनी रहती है।
सख्त गद्दे का प्रयोग
सोने के दौरान आप अपने पोश्चर को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, इसलिए पीठ के बल सख्त गद्दे पर सोना शुरू कर दें।आपके घुटनों या सिर के नीचे कोई तकिया न हो। चूंकि, इस बीमारी से ग्रसित लोगों में रात के समय दर्द ज्यादा देखा गया है, इसलिए सोने के दौरान असहजता कम से कम हो, अच्छे गद्दों का इस्तेमाल करना बेहतर रहता है।