पिछले दो दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनियाभर में कई प्रकार की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ा है। पहले जहां डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और कैंसर को उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारियों के रूप में जाना जाता था, वहीं अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। लाइफस्टाइल और खानपान की गड़बड़ी ने नॉन कम्युनिकेबल डिजीज का खतरा तेजी से बढ़ा दिया है।
Study: दुनियाभर में 40% लोग न्यूरोलॉजिकल रोगों का शिकार, इस बीमारी को लेकर WHO सबसे ज्यादा चिंतित
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई रिपोर्ट ने एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट पर रोशनी डाली है। दुनिया की करीब 40% आबादी यानी 3 अरब से अधिक लोग किसी न किसी तंत्रिका तंत्र (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी से जूझ रहे हैं।
न्यूरोलॉजिकल रोगों को लेकर डब्ल्यूएचओ चिंतित
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट ने एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट पर रोशनी डाली है। दुनिया की करीब 40% आबादी यानी 3 अरब से अधिक लोग किसी न किसी तंत्रिका तंत्र (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी से जूझ रहे हैं। हर साल इन बीमारियों के कारण 1.1 करोड़ से अधिक मौतें हो जाती हैं। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि देशों ने जल्द कदम नहीं उठाए तो यह संकट सामाजिक और आर्थिक असमानता को और बढ़ा देगा।
डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन न्यूरोलॉजी (2025) के अनुसार दुनिया के केवल 32% देशों के पास इन बीमारियों से निपटने की कोई राष्ट्रीय नीति या योजना है। कम आय वाले देशों में उच्च आय वाले देशों की तुलना में 80 गुना कम न्यूरोलॉजिस्ट (मस्तिष्क विशेषज्ञ) हैं।
सिर्फ 25% देश यानी 49 देश ही ऐसी बीमारियों को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) के तहत शामिल करते हैं, जिसका अर्थ है कि अरबों लोग बुनियादी उपचार से भी वंचित हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्ट्रोक (लकवा) की समस्या सबसे बड़ी चिंता है, जिसने करोड़ों लोगों की जान ली या उन्हें स्थायी रूप से अपंग बना दिया।
तंत्रिका तंत बीमारियों की मुख्य वजह
विशेषज्ञ दुनियाभर में बढ़ती न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की मुख्य वजह आधुनिक जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रदूषण और उम्रदराज होती आबादी का परिणाम मानते हैं। जैसे-जैसे औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, वैसे-वैसे अल्जाइमर, पार्किंसन, डिमेंशिया और स्ट्रोक जैसी बीमारियों का जोखिम भी कई गुना बढ़ गया है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार वर्ष 2050 तक 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 2.1 अरब हो जाएगी, जिससे वैश्विक रोग-भार स्वतः बढ़ेगा।
दूसरी ओर निरंतर तनाव, नींद की कमी, असंतुलित खानपान और अत्यधिक स्क्रीन टाइम ने कॉर्टिसोल हार्मोन के स्तर को बढ़ाकर मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस (स्मृति केंद्र) को कमजोर किया है, जो सोचने-निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करता है।
ऑटोइम्यून रोगों का भी जोखिम
संक्रमण और प्रतिरक्षा-संबंधी विकार भी अब मस्तिष्क रोगों के बड़े कारक बन चुके हैं। कोविड संक्रमण के बाद सामने आए पोस्ट-वायरल न्यूरोपैथी और ब्रेन फॉग जैसे लक्षण बताते हैं कि वायरल रोग भी न्यूरोलॉजिकल तंत्र को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। खराब टीकाकरण वाले देशों में मेनिन्जाइटिस और नवजात एन्सेफैलोपैथी स्थायी मस्तिष्क क्षति का कारण बन रही हैं। इसके साथ ही अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से स्मृति और एकाग्रता का क्षय समस्या बन बन चुका है।
-------------
स्रोत
11 million lives lost each year: urgent action needed on neurological care
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।