पिछले दो साल से अधिक समय से पूरी दुनिया कोरोना की मार झेल रही है। डेल्टा जैसे वैरिएंट के कारण संक्रमण के गंभीर मामले और मृत्युदर भी अधिक देखा गया। हालांकि ओमिक्रॉन संक्रमण की गंभीरता कम बताई जा रही है। अध्ययनों से पता चलता है कि ओमिक्रॉन वैरिएंट की संक्रामता दर तो अधिक है पर इसके कारण लोगों में कोविड-19 के हल्के लक्षण देखे जा रहे हैं। डेल्टा की तुलना में इस वैरिएंट से संक्रमितों में गंभीर लक्षण देखने को कम ही मिल रहे हैं। पर ऐसा नहीं है कि ओमिक्रॉन के लक्षणों को गंभीरता से न लिया जाए, इस वैरिएंट से संक्रमण के कारण भी लोगों की जान गई हैं।
Covid-19 : वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया कोरोना के गंभीर मामलों से बचने का तरीका, लैंसेट अध्ययन में बड़ा दावा
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गंभीर रोग से सुरक्षित रखती है वैक्सीन
अध्ययनकर्ताओं ने बताया कि वैक्सीन के प्रकार के आधार पर शरीर में बनने वाली प्रतिरक्षा अलग-अलग जरूर हो सकती है, पर सभी टीकों को कोरोना के गंभीर रोग से बचाव के लिए प्रभावी पाया गया है। स्वीडन स्थित उमिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पीटर नॉर्डस्ट्रॉम कहते हैं, अध्ययन के दौरान पता चला है कि वैक्सीन की दूसरी खुराक के करीब सात महीने बाद एंटीबॉडीज कम जरूर होने लगती हैं, जिससे संक्रमण होने की आशंका बढ़ सकती है। बावजूद इसके अच्छी बात यह है कि वैक्सीन उस स्थिति में भी गंभीर रोग से सुरक्षा दे सकती है।
अलग-अलग वैक्सीन की प्रभाविकता के बारे में क्या पता चला?
17 लाख से अधिक कोरोना संक्रमितों के डेटा की समीक्षा के आधार पर वैज्ञानिकों ने पाया कि वैक्सीन की दूसरी डोज के बाद कोरोना के गंभीर संक्रमण और इसके कारण होने वाली मौत का खतरा कम होता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मॉडर्ना वैक्सीन की दोनों डोज के छह महीने बाद संक्रमण के खिलाफ सुरक्षा 59 प्रतिशत और जबकि फाइजर वैक्सीन लेने वालों में 29 फीसदी बनी हुई है। हालांकि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दोनों डोज के एक महीने बाद भी संक्रमण के खिलाफ सुरक्षा कम देखी गई है।
ज्यादातर वैक्सीन हैं असरदार
इस अध्ययन से पहले कुछ अवलोकन संबंधी अध्ययनों और नैदानिक परीक्षणों के दौरान पाया गया था कि समय के साथ वैक्सीन के प्रभाव में कमी आ जाती है। उमिया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक अन्ना नॉर्डस्ट्रॉम कहते हैं, इस अध्ययन में यह जानने की कोशिश की गई है कि लंबे समय तक अलग-अलग कंपनी के टीके कितनी सुरक्षा दे सकते हैं। निष्कर्ष से पता चलता है कि ज्यादातर वैक्सीन गंभीर मामलों से सुरक्षा देने में असरदार साबित हुई हैं।
क्या है स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय?
अमर उजाला से बातचीत में इंटेंसिव केयर के चिकित्सक डॉ सौरभ अवस्थी बताते हैं, भारत के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज लग चुकी हैं उनमें कोरोना की गंभीरता का जोखिम काफी कम होता है। ओमिक्रॉन रोगियों के इलाज के दौरान भी देखा गया है कि सिर्फ उन्हीं लोगों में संक्रमण के गंभीर लक्षण देखे गए जिनका वैक्सीनेशन पूरा नहीं हो सका था। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि वैक्सीन गंभीर मामलों में बचाव का सबसे कारगर हथियार है। हालांकि अलग-अलग कंपनियों के टीके की प्रभाविकता अध्ययन का विषय है।
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स्रोत और संदर्भ
Risk of infection, hospitalisation, and death up to 9 months after a second dose of COVID-19 vaccine: a retrospective, total population cohort study in Sweden
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