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Covid-19 : वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया कोरोना के गंभीर मामलों से बचने का तरीका, लैंसेट अध्ययन में बड़ा दावा

Wed, 09 Feb 2022 04:24 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Wed, 09 Feb 2022 04:24 PM IST
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Vaccine protects against severe Covid-19 says lancet study
कोरोना के गंभीर संक्रमण से बचाव के उपाय - फोटो : iStock

पिछले दो साल से अधिक समय से पूरी दुनिया कोरोना की मार झेल रही है। डेल्टा जैसे वैरिएंट के कारण संक्रमण के गंभीर मामले और मृत्युदर भी अधिक देखा गया। हालांकि ओमिक्रॉन संक्रमण की गंभीरता कम बताई जा रही है। अध्ययनों से पता चलता है कि ओमिक्रॉन वैरिएंट की संक्रामता दर तो अधिक है पर इसके कारण लोगों में कोविड-19 के हल्के लक्षण देखे जा रहे हैं। डेल्टा की तुलना में इस वैरिएंट से संक्रमितों में गंभीर लक्षण देखने को कम ही मिल रहे हैं। पर ऐसा नहीं है कि ओमिक्रॉन के लक्षणों को गंभीरता से न लिया जाए, इस वैरिएंट से संक्रमण के कारण भी लोगों की जान गई हैं।



इस बीच गंभीर मामलों से बचाव और संक्रमितों की जान बचाने के उपायों को जानने के लिए अध्ययन कर रही वैज्ञानिकों की टीम ने बड़ा खुलासा किया है। द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैक्सीनेशन, कोरोना की गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे कारगर उपाय हो सकता है। टीके से बनी प्रतिरक्षा कुछ महीनों के भीतर खत्म होती जरूर देखी गई है, फिर भी यह गंभीर मामलों से बचाने में सबसे बेहतर साबित हो सकती है। आइए इस अध्ययन के बारे में आगे विस्तार से जानते हैं। 

Vaccine protects against severe Covid-19 says lancet study
गंभीर संक्रमण से बचाती है वैक्सीन - फोटो : Pixabay

गंभीर रोग से सुरक्षित रखती है वैक्सीन
अध्ययनकर्ताओं ने बताया कि वैक्सीन के प्रकार के आधार पर शरीर में बनने वाली प्रतिरक्षा अलग-अलग जरूर हो सकती है, पर सभी टीकों को कोरोना के गंभीर रोग से बचाव के लिए प्रभावी पाया गया है। स्वीडन स्थित उमिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पीटर नॉर्डस्ट्रॉम कहते हैं, अध्ययन के दौरान पता चला है कि वैक्सीन की दूसरी खुराक के करीब सात महीने बाद एंटीबॉडीज कम जरूर होने लगती हैं, जिससे संक्रमण होने की आशंका बढ़ सकती है। बावजूद इसके अच्छी बात यह है कि वैक्सीन उस स्थिति में भी गंभीर रोग से सुरक्षा दे सकती है। 

Vaccine protects against severe Covid-19 says lancet study
कौन सी वैक्सीन है सबसे ज्यादा असरदार? - फोटो : Istock

अलग-अलग वैक्सीन की प्रभाविकता के बारे में क्या पता चला?
17 लाख से अधिक कोरोना संक्रमितों के डेटा की समीक्षा के आधार पर वैज्ञानिकों ने पाया कि वैक्सीन की दूसरी डोज के बाद कोरोना के गंभीर संक्रमण और इसके कारण होने वाली मौत का खतरा कम होता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मॉडर्ना वैक्सीन की दोनों डोज के छह महीने बाद संक्रमण के खिलाफ सुरक्षा 59 प्रतिशत और जबकि फाइजर वैक्सीन लेने वालों में 29 फीसदी बनी हुई है। हालांकि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दोनों डोज के एक महीने बाद भी संक्रमण के खिलाफ सुरक्षा कम देखी गई है।

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गंभीर संक्रमण से बचाव के लिए टीकाकरण जरूरी - फोटो : iStock

ज्यादातर वैक्सीन हैं असरदार
इस अध्ययन से पहले कुछ अवलोकन संबंधी अध्ययनों और नैदानिक परीक्षणों के दौरान पाया गया था कि समय के साथ वैक्सीन के प्रभाव में कमी आ जाती है। उमिया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक अन्ना नॉर्डस्ट्रॉम कहते हैं, इस अध्ययन में यह जानने की कोशिश की गई है कि लंबे समय तक अलग-अलग कंपनी के टीके कितनी सुरक्षा दे सकते हैं। निष्कर्ष से पता चलता है कि ज्यादातर वैक्सीन गंभीर मामलों से सुरक्षा देने में असरदार साबित हुई हैं।

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कोरोना टीकाकण है बेहद फायदेमंद - फोटो : पीटीआई

क्या है स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय?
अमर उजाला से बातचीत में इंटेंसिव केयर के चिकित्सक डॉ सौरभ अवस्थी बताते हैं, भारत के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज लग चुकी हैं उनमें कोरोना की गंभीरता का जोखिम काफी कम होता है। ओमिक्रॉन रोगियों के इलाज के दौरान भी देखा गया है कि सिर्फ उन्हीं लोगों में संक्रमण के गंभीर लक्षण देखे गए जिनका वैक्सीनेशन पूरा नहीं हो सका था। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि वैक्सीन गंभीर मामलों में बचाव का सबसे कारगर हथियार है। हालांकि अलग-अलग कंपनियों के टीके की प्रभाविकता अध्ययन का विषय है। 

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स्रोत और संदर्भ
Risk of infection, hospitalisation, and death up to 9 months after a second dose of COVID-19 vaccine: a retrospective, total population cohort study in Sweden

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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