Medically Reviewed by Dr. Parvesh Malik
पिछले साल दिसंबर में ब्रिटेन दुनिया का पहला ऐसा देश बना था, जिसने फाइजर/बायोएनटेक की कोरोना वैक्सीन को आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी थी और अब इस वैक्सीन ने अपनी प्रभावकारिता इस तरह साबित की है कि इसे अमेरिका में पूर्ण इस्तेमाल की मंजूरी भी मिल गई है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर और उसके जर्मन साझेदार बायोएनटेक द्वारा विकसित की गई कोरोना वैक्सीन के पूर्ण इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है। इसी के साथ यह दुनिया की पहली ऐसी कोरोना वैक्सीन बन गई है, जिसे किसी देश में आपातकालीन इस्तेमाल के बाद पूर्ण रूप से मंजूरी मिली है। फिलहाल फाइजर की वैक्सीन का इस्तेमाल ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई देशों में किया जा रहा है और करोड़ों लोग इस वैक्सीन को लगवा चुके हैं। हालांकि भारत में अब तक इस वैक्सीन को मंजूरी नहीं मिली है।
फाइजर: पूर्ण इस्तेमाल की मंजूरी पाने वाली दुनिया की पहली वैक्सीन, क्या भारत में भी होगा उपयोग?
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कैसे काम करती है फाइजर की वैक्सीन?
- यह एक नई तरह की एमआरएनए वैक्सीन है, जिसे बनाने में कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं और कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए शरीर को तैयार करते हैं। दरअसल, इस वैक्सीन को जब शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, तो ये प्रतिरक्षा तंत्र को कोरोना से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने और साथ ही टी-सेल को सक्रिय कर संक्रमित कोशिकओं को नष्ट करने के लिए कहती है।
कैसे मिली पूर्ण इस्तेमाल की मंजूरी?
- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फाइजर की वैक्सीन को पूर्ण इस्तेमाल की मंजूरी देने से पहले एफडीए द्वारा पहले उसके नौ महीने के डेटा का विश्लेषण किया गया। वैक्सीन के प्रभाव को लेकर करीब 40 हजार लोगों पर अध्ययन किया गया। साथ ही वैक्सीन के साइड-इफेक्ट को भी देखा गया। उसके बाद इसे मंजूरी दे दी गई।
भारत में अब तक नहीं मिली मंजूरी
- भारत में अब तक फाइजर की वैक्सीन को मंजूरी नहीं मिल पाने का सबसे बड़ा कारण इसका रखरखाव है। दरअसल, इस वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए माइनस 70 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। ऐसे में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में तो इसका रखरखाव थोड़ा आसान है, लेकिन दूरदराज के इलाकों तक इस वैक्सीन को लेकर जाना संभव नहीं है।
नए वैरिएंट पर कितनी प्रभावी फाइजर की वैक्सीन
- ब्रिटेन में किए गए एक नए अध्ययन में यह पाया गया है कि फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन कोरोना के खतरनाक डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ काफी सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन समय के साथ उसकी प्रभावशीलता कम हो जाती है। यह अध्ययन ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और देश के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के शोधकर्ताओं ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, फाइजर वैक्सीन शुरू में एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की तुलना में अधिक सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता भी तेज गति से घटती है। यही वजह है कि वैक्सीन की तीसरी खुराक को लेकर भी अध्ययन चल रहे हैं।
नोट: डॉ. परवेश मलिक एक फिजिशियन हैं और वर्तमान में पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में कार्यरत हैं। डॉ. मलिक ने हरियाणा के महर्षि मार्कंडेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च मुल्लाना, से अपना एबीबीएस पूरा किया है। इन्होंने जनरल मेडिसिन में एमडी भी किया। पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में काम करने से पहले डॉ. परवेश ने एम.एम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च महर्षि मार्कंडेश्वर यूनिवर्सिटी में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया है।
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