पिछले तीन साल से जारी कोरोना महामारी से बचाव के लिए हम सभी ने अपनी दिनचर्या में कई तरह के बदलाव किए, सोशल आइसोलेशन उसमें से एक है। इस आदत के माध्यम से कोरोना के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि अध्ययनकर्ताओं ने एक हालिया अध्ययन में पाया है कि सोशल आइसोलेशन के कारण लोगों में डेमेंशिया रोग का खतरा बढ़ रहा है।
Alert: महामारी की इस आदत ने बढ़ा दिया है डेमेंशिया का खतरा, भारत में फिलहाल 40 लाख से अधिक लोग इसके शिकार
सोशल आइसोलेशन और डेमेंशिया का खतरा
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन और ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि सोशल आइसोलेशन डेमेंशिया के खतरे को बढ़ाने का कारण बन सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल आइसोलेशन सीधे तौर पर तो इस विकार का कारण नहीं बन रही है पर इसके कारण लोगों का एक दूसरे से संपर्क कम हो गया है।
एक दूसरे से बातचीत और मेल-जोल कम होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों में व्यवहार परिवर्तन भी देखा जा रहा है। 50-60 के आयु वर्ग वालों में भी डेमेंशिया के खतरे की पहचान की जा रही है, जोकि चिंताकारक स्थिति हो सकती है।
अध्ययन में क्या पता चला?
अमेरिका में, 65 वर्ष से अधिक आयु के 4 में से एक व्यक्ति में डेमेंशिया की समस्या देखी जा रही है। जर्नल ऑफ द अमेरिकन गैरिएट्रिक्स सोसाइटी में प्रकाशित इस शोध के लिए 2011 में 5,022 मेडिकेयर वाले प्रतिभागियों के डेटा को शामिल किया गया। अध्ययन की शुरुआत में 23% लोग कई कारणों से सोशल आइसोलेशन में थे, हालांकि उनमें डेमेंशिया के लक्षण नहीं थे। हालांकि नौ साल के इस अध्ययन के अंत तक 21 फीसदी लोगों में डेमेंशिया की समस्या का निदान किया गया।
लोगों के संपर्क में रहना बहुत आवश्यक
वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि 9 वर्षों के दौरान सोशली आइसोलेट रहने वालों में समय के साथ डेमेंशिया के विकसित होने का जोखिम 27 फीसदी अधिक हो गया। शोधकर्ता बताते हैं कि एक अन्य शोध में भी पाया गया है कि अगर लोग एक दूसरे से जुड़े रहते हैं तो इस जोखिम को 31 फीसदी तक कम किया जा सकता है।
इंसानी प्रवृत्ति एक दूसरे के साथ रहने और अपने सुख-दुख बांटने की है, इसमें होने वाली छेड़छाड़ के कारण कई प्रकार की न्यूरोलॉजिकल और व्यवहारिक समस्याओं का खतरा हो सकता है।
क्या कहते हैं शोधकर्ता?
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और अध्ययन के लेखकों में से एक डॉ एमफोन उमोह कहते हैं, संचार की सामान्य तकनीक का भी पालन करके डेमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। हमारे संज्ञानात्मक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए सोशल कनेक्शन बहुत आवश्यक है।
कोरोना महामारी के बाद से सोशल आइसोलेशन और भी बढ़ गया है, जिसके कारण आने वाले दशकों में गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। भले ही आप आइसोलेशन में हों पर किसी भी माध्यम से लोगों के संपर्क में रहें, यह मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है।