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Covid-19: आरटी-पीसीआर टेस्ट से कैसे बच जा रहे हैं नए वैरिएंट्स, क्या अब हर बार जीनोम सिक्वेंसिंग की होगी जरूरत?

Tue, 12 Apr 2022 02:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Tue, 12 Apr 2022 02:04 PM IST
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Reasons why the variants of coronavirus is not revealed in RT-PCR test, know all about genome sequencing
कोरोना संक्रमण के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट - फोटो : iStock

साल 2019 में पहली बार सामने आए नोवेल कोरोना वायरस के अब तक कई वैरिएंट्स का पता चल चुका है, जिसमें लोगों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। कुछ वैरिएंट्स को अत्याधिक संक्रामक पाया गया, वहीं कुछ के कारण लोगों में गंभीर रोग के मामले सामने आए। वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ समय से वायरस की प्रकृति में एक बड़े बदलाव को नोटिस किया है। विशेषज्ञों ने पाया कि ओमिक्रॉन के सब-वैरिएंट्स, दो वायरस के संयोजन से उत्पन्न वैरिएंट्स और हाल में सामने आया कोरोना का सबसे संक्रामक माना जा रहा एक्सई वैरिएंट, परीक्षण को चकमा दे सकता है।



कोविड-19 मामलों पर शोधकर्ताओं का कहना है कि हर वैरिएंट का अलग-अलग तरह की जीनोमिक संरचना होती है, इसी के आधार पर यह पता चलता है कि वायरस शरीर के किस हिस्से को ज्यादा प्रभावित कर सकता है और इसके परिणामस्वरूप किस तरह के लक्षणों की आशंका होती है? पर डेल्टा के बाद से सामने आए कई वैरिएंट्स की प्रकृति ऐसी देखी जा रही है, जो इसे आरटी-पीसीआर जांच को चकमा देने में मदद करती है। आइए जानते हैं कि इस स्थिति में संक्रमण का पता कैसे लगाया जा सकता है? साथ ही किन वैरिएंट्स में इस तरह की प्रकृति देखी गई है?

Reasons why the variants of coronavirus is not revealed in RT-PCR test, know all about genome sequencing
कोरोना संक्रमण का पता कैसे लगाएं - फोटो : PTI

आरटी-पीसीआर टेस्ट से संक्रमण की पुष्टि
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि महामारी की शुरुआत से ही कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि के लिए रियल टाइम आरटी-पीसीआर टेस्ट को गोल्ड स्टैंडर्ड का माना जा रहा है। इस टेस्ट के लिए नाक-मुंह से स्वाब का सैंपल लिया जाता है, जिसके आधार पर संक्रमण की पुष्टि होती है। यह टेस्ट स्थिति की गंभीरता को समझने और वायरल लोड को जानने के लिए सटीक परिणाम वाला माना जाता रहा है। हालांकि कुछ वैरिएंट्स की प्रकृति ऐसी है जो इस टेस्ट से पकड़ में नहीं आती है, ऐसी स्थिति में जीनोम सिक्वेंसिंग टेस्ट कराने की जरूरत होती है।

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टेस्ट को चकमा दे रहे हैं नए वैरिएंट्स - फोटो : Pixabay

जीनोम सिक्वेंसिंग टेस्ट क्या है?
जीनोम सिक्वेंसिंग टेस्ट के माध्मय से वायरस के संपूर्ण डीएनए की प्रकृति को जानना आसान होता है। वायरस के स्पाइक प्रोटीन में कैसा परिवर्तन है और इसके कारण किस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, इसको समझने में जीनोम सिक्वेंसिंग टेस्ट को मददगार माना जाता है। वायरस के मूल से इसके म्यूटेंट वर्जन में कितना परिवर्तन आया है इसको समझने में भी जीनोम सिक्वेंसिंग टेस्ट सहायक मानी जाती है। यही कारण है कि ओमिक्रॉन का पता लगाने के लिए यह परीक्षण किया जाता रहा है।

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कोविड-19 के नए वैरिएंट्स की प्रकृति अलग - फोटो : iStock

आरटी-पीसीआर टेस्ट से बच जा रहे हैं नए वैरिएंट्स
हाल में हुए कई अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने बताया है कि नए म्यूटेंट वैरिएंट्स के स्पाइक प्रोटीन में कुछ ऐसे अंश नहीं हैं जो आरटी-पीसीआर टेस्ट में जांच के लिए आवश्यक होते हैं। इसके अलावा नए वैरिएंट्स की प्रकृति और इसके लक्षणों में कई तरह के बदलाव देखे जा रहे हैं। शुरुआत में जहां कोरोना को श्वसन संक्रमण के तौर पर जाना जाता था, वहीं अब इसके शरीर के अन्य अंगों पर भी असर देखे जा रहे हैं। कुछ लोगों को सिर्फ पेट से संबंधित समस्याएं हो रही हैं, ऐसे में नाक के स्वाब से संक्रमण का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

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कोरोना के नए वैरिएंट्स ने बढ़ाई मुश्किलें - फोटो : Pixabay

नए वैरिएंट्स दे रहे हैं आरटी-पीसीआर टेस्ट को चकमा
ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा एजेंसी (यूकेएचएसए) ने ओमिक्रॉन बीए.2 को लेकर किए एक अध्ययन में बताया कि इसमें वह एक म्यूटेशन नहीं है, जो कोविड-19 का पता लगाने में मदद करता है। ओमिक्रॉन के 'एस' स्पाइक जीन में एक आनुवंशिक विलोपन देखा जा रहा था जिसकी मदद से आरटी-पीसीआर परीक्षण के साथ संक्रमण की पुष्टि कर पाना आसान होता था, हालांकि बीए.2 सब-वैरिएंट में वह एस जीन नहीं है, इस वजह से इसे ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।

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