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Plasma Therapy: डोनर सुमिति की कहानी, जिसके प्लाज्मा से ठीक होंगे कोरोना के मरीज

Tue, 28 Apr 2020 10:12 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Tue, 28 Apr 2020 10:12 PM IST
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Plasma therapy: Story of a Donor Sumiti help to covid 19 patients bollywood actor Kartik Aryaan shared instagram
सुमिति सिंह - फोटो : Instagram

प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के गंभीर मरीजों के भी ठीक होने की उम्मीद जगी है। इस थेरेपी के अबतक के ट्रायल के कुछ नतीजे भी अच्छे आए हैं। सरकार सभी ठीक हुए मरीजों से प्लाज्मा डोनेट करने की अपील कर रहा है। लेकिन कई वजहों से लोग सामने नहीं आ रहे हैं।



ऐसे में गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली सुमिति सिंह जैसे कुछ लोग इसके लिए दूसरों को प्रोरित कर रहे हैं। इलाज के बाद कोरोना वायरस को हराने वाली सुमिति ने अब दूसरे मरीजों को बचाने के लिए अपना प्लाज्मा डोनेट किया है।

दरअसल फिनलैंड से लौटने के बाद सुमिति को बुखार हुआ और फिर हल्की खांसी और चेस्ट में टाइटनेस की शिकायत। उनमें कोरोना के हल्के लक्षण थे। 18 मार्च को उन्हें अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अस्पताल में भर्ती कर लिया गया और 29 मार्च को इलाज के बाद वो ठीक हो गईं। उन्हें ऑक्सीजन और वेंटिलेटर पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। अहमदाबाद में कोरोना को हराकर ठीक होने वाली वो पहली मरीज थीं।

Plasma therapy: Story of a Donor Sumiti help to covid 19 patients bollywood actor Kartik Aryaan shared instagram
Sumiti Singh - फोटो : Instagram

सुमिती ने 500 एमएल प्लाज्मा डोनेट किया
उस वक्त प्लाज्मा थेरेपी को लेकर इतनी चर्चा नहीं थी और ना ही इसके ट्रायल शुरू हुए थे। लेकिन ठीक होने पर 14 दिन के बाद जब सुमिति फॉलो-अप चेकअप के किए दोबारा अस्पताल आईं, तो उन्हें डॉक्टरों ने बताया कि वो चाहें तो दूसरे कोरोना मरीजों की मदद के लिए प्लाज्मा डोनेट कर सकती हैं। सुमिति दूसरे मरीजों और इस जंग को लड़ रहे डॉक्टर्स की मदद करना चाहती थीं, लेकिन उनके और उनके परिवार के मन में कई तरह की आशंकाएं भी थी।

ठीक वैसी ही आशंकाएं जो कोरोना से ठीक हुए दूसरे लोगों के मन में आ रही हैं। प्लाज्मा में एंटीबॉडी होती है तो कहीं डोनेशन के बाद उनका एंटीबॉडी तो कम नहीं हो जाएगा? डोनेशन का प्रोसेस कहीं जटिल या पेनफुल तो नहीं होगा? निडल से कोई इन्फेक्शन तो नहीं हो जाएगा?

लेकिन डॉक्टर्स ने सुमिति के सभी सवालों का जवाब दिया। उन्हें बताया कि शरीर बहुत-से एंटीबॉडी बनाता है और डोनेशन में ठीक हुए व्यक्ति से सिर्फ उनके एंटीबॉडी का छोटा सा हिस्सा लिया जाता है और ये बहुत कम वक्त में हो जाता है। ये बिल्कुल वैसा ही प्रोसेस है जैसे ब्लड डोनेशन के वक्त होता है और इस दौरान डिस्पोजेबल निडल और ट्यूब का इस्तेमाल होता है। जो हर व्यक्ति के लिए नया लिया जाता है। डॉक्टर्स ने बताया कि कोरोना से ठीक हुए जिस भी व्यक्ति को पहले से कोई और बीमारी नहीं है और उसके शरीर में एंटीबॉडी है तो वो प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। व्यक्ति ये अपनी इच्छा से कर सकता है, उसपर कोई दबाव नहीं होता।

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प्लाज्मा थेरैपी - फोटो : social media

500 एमएल प्लाज्मा डोनेट किया
अपने सारे सवालों के जवाब मिलने के बाद सुमिति की सारी आशंकाएं दूर हो गईं और उन्होंने फैसला किया कि अपना फर्ज निभाते हुए वो दूसरे लोगों की जिंदगी बचाने की कोशिश में अपना प्लाज्मा डोनेट करेंगी। फिर क्या था, सुमिति डोनेशन के लिए पहुंच गईं। जहां प्लाज्मा डोनेशन का प्रोसेस होता है वो हिस्सा कोरोना मरीजों के वार्ड से एकदम अलग होता है। 

सुमिति बताती हैं कि उन्हें पूरी प्रोसेस में 30 से 40 मिनट का वक्त लगा और उनका 500 एमएल प्लाज्मा लिया गया। इससे पहले सुमिति ने कभी ब्लड डोनेशन नहीं किया था। उनके लिए ये सब नया था। लेकिन वो कहती हैं कि सबकुछ बहुत आसानी से हो गया। कुछ मिनटों के लिए बीच में थोड़ी घबराहट और सरदर्द जरूर हुआ था। लेकिन डॉक्टर्स की मदद से वो ठीक हो गया। डॉक्टर्स के मुताबिक इसमें कोई घबराने की बात नहीं हैं, क्योंकि ब्लड डोनेशन के वक्त भी ऐसा थोड़ी देर के लिए लगता है।

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कोरोना वायरस की जांच - फोटो : Amar Ujala

आसान प्रोसेस
सुमिति बताती हैं कि पहले उनका एक ब्लड टेस्ट हुआ, जिससे देखा गया कि उनके शरीर में एंटबॉडी है या नहीं, उनका हिमोग्लोबिन कितना है, एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी कोई बीमारी तो नहीं। सब चीजें ठीक मिलने के बाद उन्हें प्लाज्मा डोनेट करना था। वो बताती हैं कि उन्हें बस एक सूई लगने भर का दर्द हुआ। उनके शरीर से जो खून निकल रहा था, उसकी ट्यूब एक मशीन में जा रही थी। वो मशीन प्लाज्मा (पीले रंग का) और खून को अलग कर देती थी। उसके बाद खून को वापस उनके शरीर में भेज दिया जाता था।

सुमिति ने 21 अप्रैल को प्लाज्मा डोनेट किया था। डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि उनका प्लाज्मा दो दिन पहले ही एक मरीज को दिया गया है। जिसके बाद मरीज की हालत अब स्थिर है। मरीजों को इससे कितना ज्यादा फायदा मिला है, अभी इसका पता चलने में थोड़ा वक्त और लगेगा। कोरोना से ठीक हुए किसी भी व्यक्ति में अगर एंटीबॉडी मिलती है, अब कोई दवाई नहीं चल रही है, कोई और बीमारी नहीं है तो वो प्लाज्मा डोनेट करने के लिए आगे आ सकता है।

सुमिति कहती हैं, "कोरोना पेशेंट को 10 से 20 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता हैं। इस दौरान हर दो या तीन दिन में ब्लड टेस्ट लिया जाता है या स्वाब टेस्ट होते हैं। ये सभी बहुत अनकंफर्टेबल होता है। कोई भी नहीं चाहता कि प्रिक लगे और कोई इसे इंज्वाय नहीं करता। लेकिन जब आप अस्पताल से बाहर आ जाते हैं तो आपको लगता है कि बस अब ये सब खत्म हो गया। लेकिन जब कोई कहता है कि आपको प्लाज्मा देना है तो आप सोचने लगते हैं कि फिर से उन सब चीजों से गुजरना होगा।"

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सुमिति सिंह और कार्तिक आर्यन - फोटो : सोशल मीडिया
सुमिति बताती है- "मैं यही कहूंगी कि प्रोसेस इतना पेनफुल नहीं होता। अगर आप इतना कर ही चुके हैं तो किसी और की जिंदगी के लिए एक बार और करने में कुछ नहीं जाएगा। हम लकी थे कि हम बच गए। लेकिन अब हमारे पास दूसरों की जान बचाने का एक मौका है।"

सुमिति के घर में उनके माता-पिता और एक बहन हैं। सुमिति इस बात का शुक्र जताती हैं कि उनसे उनके घर वालों को वायरस ट्रांसफर नहीं हुआ था। सुमिति अब स्वस्थ्य हैं और घर पर हैं। लेकिन अब भी दूसरे की तरह ही पूरी सावधानी ले रही हैं। क्योंकि डब्ल्यूएचओ ने भी कहा है कि इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि एंटीबॉडी डेवलप हो जाने के बाद किसी को दोबारा कोरोना नहीं हो सकता।

बॉलीवुड अभिनेता कार्तिक आर्यन ने भी सुमिति के इस योगदान की सराहना की है।
 

 

 

 

 

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So proud of @sumitisingh 👏🏻👏🏻 I urge all survivors to check with their doctors and donate their blood plasma if eligible to help critical patients who are on the road to recovery.🙏🏻 Also a big Thank You Sumiti for spreading awareness #KokiPoochega . . . #Repost @sumitisingh ・・・ I donated my blood plasma today— A person who has recovered from COVID is able to make antibodies against it . Also if you don’t have any pre existing ailments you are considered a healthy body and CAN donate your blood plasma, if willing, for the benefit of patients in a critical condition. With great joy and pride I am able to share that I fit all the necessary criteria to donate plasma and did so today at the Red Cross Ahmedabad. The procedure:- The procedure to donate plasma is the same as when you donate blood. There is one needle that is used to draw blood from your body, and the blood runs through tubes that carry it into a machine. That machine separates the plasma from the blood . The same needle sends back blood to your body while the (yellowish coloured) plasma is collected in a bag. It's all toO cool. This happens through multiple cycles. I was also informed that the body will replenish the plasma in 24 - 48 hours. Dear Positives/Now Negatives... This was my first blood plasma donation experience. My feelings were oscillating between nervousness and excitement . On one part I was unsure about the procedure and how I’d feel thereafter . On the other hand there was a desire to contribute in any way I could in the war against COVID. If it helped anyone , anywhere I was doing it . Expect 2 needle pricks. The first one to check if you have antibodies .The second one to draw blood out and transfer it back in. The procedure lasted 30-40 minutes. Most of this time I was fine, however for 3- 4 minutes I felt nauseous and light headed. My doctors at the Red Cross, immediately helped me with what I was feeling and put me at ease. I have been completely fine, thereafter. SVP hospital is the first in India to get approvals for trials for Plasma Therapy and I wish them all the luck in the world & thank them for taking me through this. If I can do it.... maybe you can too

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