पिछले कुछ वर्षों में भारत में टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के मामलों में भारी वृद्धि देखने को मिली है, जोकि काफी चिंताजनक है। चिंता इस बात को लेकर भी है क्योंकि भारत ने इस साल (2025) तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, हालांकि अब भी ये लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है।
Tuberculosis: दवाओं से भी हार न मानने वाली टीबी का भारतीय विशेषज्ञों ने खोजा इलाज, रोगियों के लिए बड़ी राहत
- भारतीय वैज्ञानिकों ने मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी को कमजोर करने के लिए न्यूट्रास्युटिकल चिकित्सा पद्धति की खोज की है, जो मरीज की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाकर टीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है।
- इस चिकित्सा पद्धति को एटीएलएस-पीए 2021 नाम दिया है।
ड्रग रेसिस्टेंट टीबी का खोजा नया इलाज
अब भारतीय वैज्ञानिकों ने मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी को कमजोर करने के लिए न्यूट्रास्युटिकल चिकित्सा पद्धति की खोज की है, जो मरीज की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाकर टीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है। इस चिकित्सा पद्धति को एटीएलएस-पीए 2021 नाम दिया है, जिसमें एल-सेरीन और पामिटॉयल सीओ-ए जैसे दो अणु शामिल हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ कुछ अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने यह खोज की है।
न्यूट्रास्युटिकल के बारे में जानिए
न्यूट्रास्युटिकल वह उत्पाद होते हैं, जो पोषण और औषधीय गुणों को एक साथ लेकर आते हैं। ये न केवल रोग से लड़ने में मदद करते हैं बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। एटीएलएस-पीए 2021 इस श्रेणी का एक टीबी विशिष्ट उत्पाद है जो शरीर के इम्यून रिस्पांस को टीबी के खिलाफ सशक्त करता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि एमडीआर टीबी के मामलों में लंबे समय तक इलाज, महंगी दवाएं और उच्च मृत्यु दर जैसी समस्याएं आम हैं, ऐसे में एटीएलएस-पीए 2021 एक कम लागत, कम साइड इफेक्ट और अधिक असरदार विकल्प के रूप में उभर सकता है।
यह उपचार विशेषरूप से एमडीआर टीबी रोगियों में पारंपरिक एंटी-टीबी दवाओं की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए खोजा गया है। विशेषज्ञ कहते हैं, यह न केवल फेफड़ों में मौजूद बैक्टीरिया को सीधे मारता है, बल्कि नाइट्रिक ऑक्साइड उत्पन्न कर हाइपोक्सिया जैसी स्थिति को भी ठीक करता है जो गंभीर टीबी मामलों में आम होती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
एमिटी सेंटर फॉर ट्रांसलेशन रिसर्च के उप निदेशक प्रो. हृदयेश प्रकाश ने बताया कि टीबी के उपचार में यह थेरेपी दवाओं के प्रतिरोधी माइक्रोबैक्टीरिया को पारंपरिक दवाओं के प्रति फिर से संवेदनशील बनाती है। यानी जो दवाएं पहले असर नहीं कर रही थीं, वे इस चिकित्सा पद्धति के सहारे फिर से प्रभावी हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि भारत ने इस नई खोज को पेटेंट भी कराया है।
यह भारत का पहला आईसीएमआर अनुमोदित न्यूट्रास्युटिकल है, जो एमडीआर टीबी पर केंद्रित है। उन्होंने बताया कि यह नवाचार टीबी मुक्त मिशन- 2025 के लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होगा।
एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामलों में भी बढ़ोतरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों का निदान किया जा रहा है जिनमें टीबी संक्रमण के कोई लक्षण नहीं होते हैं। जब उनकी इम्युनिटी कमजोर होने लगती है तो इसके स्पष्ट संकेत दिखने लगते हैं। आमतौर पर 15 दिन से अधिक समय तक खांसी, बलगम का आना टीबी के लक्षण माने जाते हैं, लेकिन बिना खांसी- बलगम के भी यह बीमारी को सकती है।
ग्रेटर नोएडा स्थित राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में बीते वर्ष 1,000 से अधिक मरीजों की टीबी की जांच की गई है। इसमें से 50 फीसदी मरीज एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे मरीज खांसी-बलगम के बिना सामने आ रहे हैं। यहां पढ़िए पूरी रिपोर्ट
-----------------------------
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।