तनाव, मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्या है जिसके कारण आप अक्सर घबराहट , चिड़चिड़ापन, काम में मन न लगने और मूड से संबंधित विकारों का अनुभव करते रह सकते हैं। लंबे समय तक बनी रहने की तनाव की इस स्थिति पर अगर ध्यान न दिया जाए तो इसके कारण अवसाद होने का जोखिम भी बढ़ जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि इस स्थिति में तनाव सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य विकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि शरीर पर भी इसके कई प्रकार के दुष्प्रभाव दिखने शुरू हो जाते हैं?
Stress: लंबे समय से रहा है तनाव तो जानिए पूरे शरीर पर क्या हो सकते हैं इसके दुष्प्रभाव?
हृदय प्रणाली पर इसका असर
लंबे समय से बने रहने वाले तनाव का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव हृदय प्रणाली पर देखा जाता रहा है। स्ट्रेस की स्थिति में आपके रक्तप्रवाह में एड्रेनालाईन हार्मोन की मात्रा बढ़ने लगती है। इससे आपका हृदय और अन्य महत्वपूर्ण अंग हाई अलर्ट पर चले जाते हैं, हृदय गति और रक्तचाप बढ़ जाता है। एड्रेनालाईन के कारण ब्लड शुगर की समस्या बढ़ने का भी खतरा हो सकता है।
मांसपेशियों में बढ़ने लगती है दिक्कत
जैसे-जैसे आपके तनाव का स्तर बढ़ता है, आपकी मांसपेशियों पर इसका असर दिखना शुरू हो सकता है। मांसपेशियों में जकड़न-कसाव की समस्या के कारण माइग्रेन और कंधे या गर्दन में दर्द हो सकता है। मांसपेशियों में बढ़े तनाव की स्थिति के साथ, स्ट्रेस के कारण बढ़ा हुआ कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर मांसपेशियों के ऊतकों के क्षीण होने का कारण बन सकता है जिसके कारण मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं और क्रोनिक दर्द का जोखिम बढ़ता जाता है।
सांस की समस्याओं का जोखिम
सांस की तकलीफ या तेजी से सांस लेना, तनाव की स्थिति में होने वाला सामान्य शारीरिक लक्षण है। हालांकि अगर तनाव लंबे समय तक बनी रहती है तो यह बेचैनी, अस्थमा या पैनिक अटैक का कारण भी बन सकती है। तनाव की समस्या आपके इम्यून रिस्पांस को कमजोर कर देती है जिसके कारण फ्लू जैसी बीमारियों के बार-बार होने का जोखिम पहले की तुलना में काफी बढ़ जाता है। आपको अक्सर पैनिक अटैक की दिक्कत हो सकती है।
हो सकता है हार्मोन इंबैलेंस
इंडोक्राइन सिस्टम का नेटवर्क है जो हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एडर्नल आदि ग्रंथियों से हार्मोन रिलीज कराने में मदद करता है। तनाव की स्थिति में इन हार्मोंन्स के रिलीज होने पर भी असर हो सकता है। शरीर में कई हार्मोंन्स बहुत अधिक या कम हो सकते हैं, जिससे शरीर का पूरा फंक्शन खराब होने लगता है। यह स्थिति डिप्रेशन और पीटीएसडी जैसी मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों का कारण बन सकती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है।
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