मुजफ्फरपुर में एक्यूट इनसेफिलाइटिस सिंड्रोम (एइस) की वजह से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा 103 तक पहुंच गया है। इस बीच शहर की शान और फलों की रानी के तौर पर पहचाने जाने वाला रसीला फल 'लीची' विवादों के केंद्र में आ गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ साथ बिहार सरकार के मंत्रियों तक ने मीडिया से बातचीत में कहा की बच्चों की मौत के पीछे उनका लीची खाना भी एक कारण हो सकता है। लीची के बीज में मेथाईलीन प्रोपाइड ग्लाईसीन (एमसीपीजी) की सम्भावित मौजूदगी को 'पहले से ही कम ग्लूकोस स्तर वाले' कुपोषित बच्चों को मौत के कगार पर ला खड़ा करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर चिकित्सा विशेषज्ञ बंटे हुए हैं और हर बार वह यह भी जोड़ते हैं कि इस मामले में अभी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अभी तक हुए शोधों के अनुसार लीची को बच्चों की मौत के पीछे छिपे कई कारणों में से सिर्फ़ एक 'सम्भावित' कारण माना गया है।
मुजफ्फरपुर: क्या 128 बच्चों की मौत का कारण सच में लीची है?
'बिहार लीची ग्रोअर असोसिएशन' के बच्चा प्रसाद सिंह को लगता है कि लीची को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इनसेफ़िलाइटिस की वजह से बच्चों के जान गंवाने और लीची की फ़सल का समय और मौसम लगभग एक है। "अगर लीची खाने से बच्चे मरते तो अच्छे बड़े शहरी घरों के भी बच्चे मरते। लेकिन ऐसा तो नहीं है। सिर्फ़ ग़रीब परिवारों के कुपोषित बच्चे ही इनसेफ़िलाइटिस का शिकार हो रहे हैं। जबकि यहां की लीची तो मुज़फ़्फ़रपुर-पटना से लेकर दिल्ली बम्बई तक में सब लोग खाते हैं। फिर मौतें सिर्फ़ ग्रामीण मुज़फ़्फ़रपुर के सबसे ग़रीब घरों में क्यों हो रही है? मई के आख़िरी और जून के पहले हफ़्ते में होने वाली लीची की फ़सल से सीधे तौर पर इस क्षेत्र के 50 हज़ार से भी ज़्यादा किसान परिवारों की आजीविका जुड़ी है। बच्चा प्रसाद बताते हैं कि गर्मियों के 15 दिनों में ही यहां ढाई लाख टन से ज़्यादा की लीची का उत्पादन होता है। "मुज़फ़्फ़रपुर और बिहार की बिक्री का तो कोई निश्चित आंकड़ा नहीं लेकिन बिहार से बाहर भारत के अन्य राज्यों में भेजी जाने वाले लीची 15 दिनों की सालाना फ़सल में ही गंडक नदी के क्षेत्र वाले बिहार के किसानों को अनुमानित 85 करोड़ रुपए तक का व्यवसाय दे जाती है। ऐसे में लीची की हो रही इस बदनामी से यहां के किसानों के पेट पर हमला हो रहा है। इससे आनी वाली फ़सल में हमें बहुत नुक़सान होगा"।
लीची उगाने वाले एक स्थानीय किसान भोला झा को लगता है कि लीची को बदनाम करने के पीछे 'आम' के व्यापारियों की लॉबी का हाथ है। बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "बच्चों का मरना हम सबके लिए दुखद है। लेकिन इसके सही कारण को ढूँढा जाना चाहिए। लीची यहां के बच्चे सदियों से खाते आ रहे हैं। लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई की मैंगो लॉबी इस तरह से लीची को बदनाम करने की कोशिश कर रही है क्योंकि सीजन में उनका मैंगो बिकता है 10-12 रुपए के रेट पर, वहीं भारत के महानगरों में लीची 250 रुपए तक के रेट पर बेचा जाता है। इसीलिए लीची किसानों को इस तरह से बदनाम करने की कोशिशें की जा रही है। कोई भी सबूतों के साथ कुछ नहीं कह रहा, सिर्फ़ क़यासों के आधार पर एक पूरी फ़सल को बदनाम किया जा रहा है"।