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मुजफ्फरपुर: क्या 128 बच्चों की मौत का कारण सच में लीची है?

Tue, 18 Jun 2019 02:55 PM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क
लाइफस्टाइल डेस्क Published by: पंखुड़ी सिंह Updated Tue, 18 Jun 2019 02:55 PM IST
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litchi cause Acute encephalitis syndrome children dying in muzaffarpur

मुजफ्फरपुर में एक्यूट इनसेफिलाइटिस सिंड्रोम (एइस) की वजह से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा 103 तक पहुंच गया है। इस बीच शहर की शान और फलों की रानी के तौर पर पहचाने जाने वाला रसीला फल 'लीची' विवादों के केंद्र में आ गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ साथ बिहार सरकार के मंत्रियों तक ने मीडिया से बातचीत में कहा की बच्चों की मौत के पीछे उनका लीची खाना भी एक कारण हो सकता है। लीची के बीज में मेथाईलीन प्रोपाइड ग्लाईसीन (एमसीपीजी) की सम्भावित मौजूदगी को 'पहले से ही कम ग्लूकोस स्तर वाले' कुपोषित बच्चों को मौत के कगार पर ला खड़ा करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर चिकित्सा विशेषज्ञ बंटे हुए हैं और हर बार वह यह भी जोड़ते हैं कि इस मामले में अभी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अभी तक हुए शोधों के अनुसार लीची को बच्चों की मौत के पीछे छिपे कई कारणों में से सिर्फ़ एक 'सम्भावित' कारण माना गया है।

litchi cause Acute encephalitis syndrome children dying in muzaffarpur
- फोटो : अमर उजाला
लेकिन इस पूरे विवाद का असर मुज़फ़्फ़रपुर की शान मानी जाने वाली लीची के व्यपारियों और इस रसीले फल के किसानों पर भी पड़ रहा है। लीची से होने वाली कमाई पर पूरी तरह आश्रित मुज़फ्फरपुर क्षेत्र के किसानों को लगता है कि बिना निर्णायक सबूत के उनकी फ़सल की इस बदनामी से उनकी बिक्री पर बुरा असर पड़ेगा। शहर की आम जनता भी मानती है कि मासूमों की मौत का असली कारण न ढूंढ पाने वाली बिहार सरकार लीची पर ठीकरा फोड़ रही है। मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन के ठीक सामने लीची बेच रहे किसानों के साथ खड़े स्थानीय निवासी सुकेश कुमार शाही लीची को अपने शहर की शान मानते हैं।  रसीले पल्प वाले इस फल की टोकरी की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं। "हमारी लीची ही तो हमारी शान है. मैं साठ से ऊपर का हो गया हूं और सारी ज़िंदगी यहीं लीची खाते हुए गुज़ार दी। लोग भले ही कहने को जो मर्ज़ी कहें लेकिन सच तो यही की यहां के बच्चे सदियों से लीची खाते हुए ही बड़े हो रहे हैं। धूप की वजह से बच्चे बीमार पड़ सकते हैं क्योंकि मुज्ज़फरपुर में ऐसी 45 डिग्री वाली धूप कभी नहीं देखी। लीची को बिना वजह बदनाम किया जा रहा है जबकि मुज़फ़्फ़रपुर का मतलब ही लीची है और लीची का पर्याय मुज़फ़्फ़रपुर"।
 
litchi cause Acute encephalitis syndrome children dying in muzaffarpur
- फोटो : PTI

'बिहार लीची ग्रोअर असोसिएशन' के बच्चा प्रसाद सिंह को लगता है कि लीची को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इनसेफ़िलाइटिस की वजह से बच्चों के जान गंवाने और लीची की फ़सल का समय और मौसम लगभग एक है। "अगर लीची खाने से बच्चे मरते तो अच्छे बड़े शहरी घरों के भी बच्चे मरते। लेकिन ऐसा तो नहीं है। सिर्फ़ ग़रीब परिवारों के कुपोषित बच्चे ही इनसेफ़िलाइटिस का शिकार हो रहे हैं। जबकि यहां की लीची तो मुज़फ़्फ़रपुर-पटना से लेकर दिल्ली बम्बई तक में सब लोग खाते हैं। फिर मौतें सिर्फ़ ग्रामीण मुज़फ़्फ़रपुर के सबसे ग़रीब घरों में क्यों हो रही है? मई के आख़िरी और जून के पहले हफ़्ते में होने वाली लीची की फ़सल से सीधे तौर पर इस क्षेत्र के 50 हज़ार से भी ज़्यादा किसान परिवारों की आजीविका जुड़ी है। बच्चा प्रसाद बताते हैं कि गर्मियों के 15 दिनों में ही यहां ढाई लाख टन से ज़्यादा की लीची का उत्पादन होता है। "मुज़फ़्फ़रपुर और बिहार की बिक्री का तो कोई निश्चित आंकड़ा नहीं लेकिन बिहार से बाहर भारत के अन्य राज्यों में भेजी जाने वाले लीची 15 दिनों की सालाना फ़सल में ही गंडक नदी के क्षेत्र वाले बिहार के किसानों को अनुमानित 85 करोड़ रुपए तक का व्यवसाय दे जाती है। ऐसे में लीची की हो रही इस बदनामी से यहां के किसानों के पेट पर हमला हो रहा है। इससे आनी वाली फ़सल में हमें बहुत नुक़सान होगा"।
 

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लीची उगाने वाले एक स्थानीय किसान भोला झा को लगता है कि लीची को बदनाम करने के पीछे 'आम' के व्यापारियों की लॉबी का हाथ है। बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "बच्चों का मरना हम सबके लिए दुखद है। लेकिन इसके सही कारण को ढूँढा जाना चाहिए। लीची यहां के बच्चे सदियों से खाते आ रहे हैं। लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई की मैंगो लॉबी इस तरह से लीची को बदनाम करने की कोशिश कर रही है क्योंकि सीजन में उनका मैंगो बिकता है 10-12 रुपए के रेट पर, वहीं भारत के महानगरों में लीची 250 रुपए तक के रेट पर बेचा जाता है। इसीलिए लीची किसानों को इस तरह से बदनाम करने की कोशिशें की जा रही है। कोई भी सबूतों के साथ कुछ नहीं कह रहा, सिर्फ़ क़यासों के आधार पर एक पूरी फ़सल को बदनाम किया जा रहा है"। 
 

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- फोटो : अमर उजाला
इस मामले में और जानकारी हासिल करने के लिए हमने मुज़फ़्फ़रपुर में मौजूद राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉक्टर विशाल नाथ ने बात की। लीची को इनसेफ़िलाइटिस का कारण बताने के लिए पुख़्ता सबूतों की ना मौजूदगी का हवाला देते हुए वह बताते हैं, "दक्षिण अमरीका के कुछ हिस्सों में लीची के जैसा ही दिखने वाला 'एकी' नाम के फल के बीज में एमसीपीजी के ट्रेसेस पाए गए हैं। बात यह है कि वनस्पति विज्ञान की नज़र में एकी और लीची 'सापंडेसिया' नामक एक ही प्लांट फ़ैमिली से आते हैं। इसलिए जब बंगलादेश में इनसेफ़िलाइटिस के कुछ मामले आना शुरू हुए तो इस पर शोध कर रहे कुछ बाल रोग विशेषज्ञों ने एक ही प्लांट फ़ैमिली और फ़सल के एक ही मौसम की वजह से इसे 'लीची डीसीज़' या 'लीची रोग' कहना शुरू कर दिया। जबकि लीची से इनसेफ़िलाइटिस के सीधे तौर पर जुड़े होने के कोई निर्णायक सबूत नहीं है।"

 
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