जामा ब्लड ग्रुप: महिला का खून बना वैज्ञानिकों के लिए पहेली, जांच में सामने आया इंसानों का 49वां ब्लड ग्रुप
ब्रिटेन और इजराइल के वैज्ञानिकों ने इंसानों में ‘जामा’ नाम के नए ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की है, जिसे 49वें ब्लड ग्रुप सिस्टम के रूप में मान्यता मिली है। इसका पता दुर्लभ एंटीबॉडी के अध्ययन से चला। इससे पहले हाल के वर्षों में एमएएल और सीआरआईबी ब्लड ग्रुप की भी खोज चर्चा में रही है।
विस्तार
हमारे शरीर में मौजूद खून सिर्फ लाल रंग का तरल पदार्थ भर नहीं है, इसी के जरिए शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाता है। जब किसी व्यक्ति को मेडिकल जरूरतों के लिए खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है, तो सबसे पहले उसका ब्लड ग्रुप चेक किया जाता है। ब्लड ग्रुप के आमतौर के चार प्रकार (ए, बी, एबी और ओ) सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हैं।
जो चीजें आपके रक्त को किसी और के रक्त से अलग बनाती है, वह है प्रोटीन अणुओं का अनूठा संयोजन- जिन्हें एंटीजन और एंटीबॉडी कहा जाता है। एंटीजन लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर होते हैं जबकि एंटीबॉडीज आपके प्लाज्मा में मौजूद होती हैं। इन्हीं एंटीजन और एंटीबॉडी के आधार पर ही निर्धारित होता है कि आपका ब्लड ग्रुप कौन सा है?
अब ब्रिटेन और इजराइल के वैज्ञानिकों ने इंसानों में एक नए ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की है। इसे ‘जामा’ नाम दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय सोसाइटी ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन ने इसे इंसानों के 49वें ब्लड ग्रुप सिस्टम के रूप में मान्यता दी है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि एफ-11 आर एक विशिष्ट जीन है, जो मानव शरीर में जामा नामक प्रोटीन का निर्माण करता है और इसी के आधार पर इस ब्लड ग्रुप का नाम जामा रखा गया है।
आइए जानते हैं कि ये खोज क्यों इतनी महत्वपूर्ण है और इसका किस तरह से असर हो सकता है?
इजराइली महिला के खून से हुई पहचान
वैज्ञानिकों को इस नए ब्लड ग्रुप का पता एक इजराइली महिला और उसके भाई के खून में मौजूद एक दुर्लभ एंटीबॉडी के अध्ययन के दौरान चला। एंटीबॉडी शरीर में बनने वाला एक सुरक्षा प्रोटीन है, जो किसी बाहरी चीज (बैक्टीरिया-वायरस जैसे रोगजनकों आदि) को पहचानकर उसके खिलाफ प्रतिक्रिया करता है, जिसे शरीर अपना नहीं मानता।
- शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने एफ-11-आर जीन और उससे बनने वाले जेएएम-ए प्रोटीन से जुड़े आनुवंशिक बदलावों की पहचान की।
- जीन को आसान भाषा में शरीर के अंदर मौजूद एक तरह का जैविक निर्देश समझ सकते हैं, जबकि प्रोटीन शरीर में अलग-अलग जरूरी काम करने वाले पदार्थ होते हैं।
- ‘जामा’ ब्लड ग्रुप वाले लोगों में सामान्य लोगों के खून में पाया जाने वाला एक खास एंटीजन नहीं होता।
- एंटीजन को आसान भाषा में कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ऐसी पहचान समझा जा सकता है, जिसे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पहचानती है।
ऐसे बेहद दुर्लभ मामलों में अगर ऐसे व्यक्ति को सामान्य रक्त चढ़ा दिया जाए, तो उसका शरीर रक्त को अलग समझ सकता है। इसके बाद शरीर एंटीबॉडी बना सकता है, जो चढ़ाए गए लाल रक्त कोशिकाओं पर अटैक कर सकती है। इससे गंभीर ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन यानी रक्त चढ़ाने के बाद शरीर में खतरनाक प्रतिक्रिया हो सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह नई खोज ऐसे दुर्लभ मरीजों और उनके लिए उपयुक्त रक्तदाताओं की पहचान करने में मदद करेगी। डीएनए जांच के जरिए मरीजों और रक्तदाताओं की पहचान की जा सकेगी। इससे भविष्य में सुरक्षित रक्त चढ़ाने और दुर्लभ एंटीबॉडी से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिलने की उम्मीद है।
क्यों जरूरी है दुर्लभ ब्लड ग्रुप्स की पहचान?
ज्यादातर लोग स्कूल की पढ़ाई में एबीओ और आरएच ब्लड ग्रुप के बारे में ही जानते हैं। लेकिन इंसानों की लाल रक्त कोशिकाओं पर कई अलग-अलग तरह के ब्लड ग्रुप सिस्टम पाए जाते हैं। इन कोशिकाओं की सतह पर बहुत छोटे प्रोटीन और शुगर जैसे पदार्थ मौजूद होते हैं। ये पदार्थ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को यह पहचानने में मदद करते हैं कि कौन-सी कोशिका शरीर की अपनी है?
- दुर्लभ ब्लड ग्रुप की खोज से रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया को और सुरक्षित बनाने में मदद मिलती है। रक्त चढ़ाते समय अगर गलत ब्लड ग्रुप का इस्तेमाल हो जाए, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गंभीर प्रतिक्रिया कर सकती है।
एमएएल और सीआरआईबी ब्लड ग्रुप की खोज
- सितंबर 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हमने एमएएल ब्लड ग्रुप की खोज के बारे में जानकारी दी थी।
इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी और एनएचएस ब्लड एंड ट्रांसप्लांट (NHSBT) के शोधकर्ताओं ने ये खोज की थी। इस खोज ने ब्लड ग्रुप्स को लेकर करीब 50 साल से बने एक रहस्य से पर्दा उठा दिया है। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट ऑफ इंग्लैंड में सेल बायोलॉजिस्ट टिम सैचवेल बताते हैं, एमएएल एक बहुत छोटा प्रोटीन है जिसमें कुछ दिलचस्प गुण हैं, जिसकी वजह से इसे पहचानना मुश्किल हो सकता है। एमएएल प्रोटीन कोशिका झिल्ली को स्थिर रखने जैसे कार्यों में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
- इसके बाद अगस्त 2025 में भारत और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की टीम ने CRIB (सीआरआईबी) नाम के ब्लड ग्रुप की खोज की थी।
भारत में एक 38 वर्षीय महिला की सर्जरी के दौरान इस नए रक्त समूह का पता चला था। अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती महिला को ब्लड चढ़ाने की जरूरत थी। हालांकि उसका ब्लड ग्रुप किसी भी अन्य ब्लड ग्रुप से मेल नहीं खाता था। फिर टीम ने इसे अन्य ब्लड ग्रुप के साथ मिलाकर परीक्षण किया, लेकिन हर बार यह प्रतिक्रिया दे रहा था। जिसके बाद जांच में पाया गया कि महिला के ब्लड का सैंपल एकदम से नया और अज्ञात था। इस ब्लड ग्रुप के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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