मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाता जा रहा है। मोबाइल फोन से निकलने वाली ब्लू लाइट के संपर्क को अध्ययनों में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से सेहत के लिए नुकसानदायक पाया गया है। इसी तरह स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, जिन लोगों का सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बीतता है, उनमें मानसिक अस्थिरता, तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का खतरा भी अधिक हो सकता है।
Mental Health: मोबाइल से हो रही "डूमस्क्रॉलिंग" की बीमारी, ये लक्षण हैं तो तुरंत दिखाएं डॉक्टर को
- चिंताजनक रूप से भारतीय लोगों का मोबाइल फोन के इस्तेमाल और सोशल मीडिय पर बहुत अधिक समय बीत रहा है, जिसका कई प्रकार से नकारात्मक असर हो सकता है। ये युवाओं में डूमस्क्रॉलिंग की दिक्कत भी बढ़ाती जा रही है।
भारतीय लोगों में सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया उपयोगकर्ता देश है। डाटा रिपोर्टल (2025) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 82 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से लगभग 47 करोड़ सक्रिय सोशल मीडिया यूजर हैं। एक औसत भारतीय यूजर रोजाना 2.7 घंटे सोशल मीडिया पर बिताता है। इसी लगातार बढ़ते उपयोग के कारण डूमस्क्रॉलिंग भारत में एक नई मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बन गई है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय उपयोगकर्ताओं में सबसे बड़ा वर्ग 18 से 24 वर्ष आयु का है। यही वर्ग डूमस्क्रॉलिंग की आदत का सबसे ज्यादा शिकार हो रहा है।
आईआईटी बॉम्बे और एनआईएमएचएएनएस की ताजा संयुक्त रिपोर्ट बताती है कि लगभग 36% भारतीय किशोर रोजमर्रा की जिंदगी में सोशल मीडिया कंटेंट से उत्पन्न तनाव और चिंता महसूस करते हैं।
डूमस्क्रॉलिंग का खतरा
सोशल मीडिया और न्यूज प्लेटफॉर्म्स पर घंटों नकारात्मक खबरें पढ़ने या देखते रहने की आदत (डूमस्क्रॉलिंग) हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर गहरे निशान छोड़ रही है। नेशनल जियोग्राफी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक लगातार ग्राफिक इमेजेज, गुस्सा भड़काने वाली खबरें और निगेटिव न्यूज साइकल न केवल हमें विचलित करते हैं, बल्कि यह दिमाग की संरचना और स्ट्रेस रिस्पॉन्स सिस्टम को भी बदल देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब हम बार-बार डर, गुस्सा या दुख से जुड़ी खबरों को देखते हैं तो मस्तिष्क का ऐमिगडाला हिस्सा अत्यधिक सक्रिय हो जाता है। यह वही क्षेत्र है जो हमारे डर और तनाव को नियंत्रित करता है। परिणामस्वरूप दिमाग हाइपर-अलर्ट मोड में चला जाता है, जिससे व्यक्ति खतरा महसूस करने लगता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर
रिपोर्ट में बताया गया कि लगातार डूमस्क्रॉलिंग, मस्तिष्क की न्यूरल सर्किट्री को रीवायर कर देती है। इसका मतलब यह है कि दिमाग नकारात्मक जानकारी को पकड़ने और उस पर प्रतिक्रिया देने में तेज हो जाता है, जबकि सकारात्मक चीजों पर ध्यान देने की क्षमता कम होने लगती है। लगातार निगेटिव कंटेंट देखने से चिंता और अवसाद का खतरा बढ़ जाता है।
तनाव बढ़ने के कारण नींद का पैटर्न बिगड़ जाता है। नकारात्मक सोच हावी होने से व्यक्ति रिश्तों और समाज से दूर होने लगता है। लगातार तनावग्रस्त रहने से दिमाग की कार्यक्षमता और निर्णय लेने की क्षमता घटती है।
कैसे रहें इससे सुरक्षित?
अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट्स का कहना है कि डूमस्क्रॉलिंग से बचने के लिए डिजिटल डिटॉक्स जरूरी है। इसके लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करना, सोने से पहले नेगेटिव न्यूज या सोशल मीडिया से दूरी बनाना, सकारात्मक गतिविधियों जैसे पढ़ाई, कला या ध्यान (मेडिटेशन) पर समय देना, नियमित व्यायाम और नींद की आदतों को सुधारना जरूरी है। डूमस्क्रॉलिंग केवल एक आदत नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन रही है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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