यदि हम एक काल्पनिक दुनिया की बात करें जहां हमारे पास कोरोना की वैक्सीन पहले से ही उपलब्ध है, तो ऐसे में दुनिया के नेताओं के सामने बड़ा सवाल ये है कि इतनी बड़ी आबादी तक ये वैक्सीन कैसे पहुंचाई जाए। बीमारी का सबसे ज्यादा खतरा डॉक्टर, नर्स और दूसरे हेल्थकेयर वर्कर्स को है, इसलिए उन्हें सबसे पहले सुरक्षा देनी होगी, लेकिन ये इतना आसान नहीं है। बूढ़े लोगों को भी कोरोना के संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा है। कनाडा के ग्यूलेफ विश्वविद्यालय में वैक्सीनोलॉजी के प्रोफेसर श्यान शरीफ कहते हैं, 'हमारे पास बूढ़े लोगों के लिए डिजाइन की गई वैक्सीन की संख्या बहुत कम है। पिछले 100 सालों में ज्यादातर वैक्सीन बच्चों को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं।'
Coronavirus: क्यों आसान नहीं होगा बुजुर्गों का टीकाकरण? ये है बड़ी वजह
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वृद्धों के शरीर के रक्षा तंत्र का असर
शरीफ के मुताबिक, 'बच्चों से जुड़ी बीमारियों के बारे में हमारे पास बहुत ज्यादा जानकारियां हैं, लेकिन जब जवान या बूढ़े लोगों की बात आती है तो इस मामले में हमारे पास बहुत अनुभव नहीं है।' वो कहते हैं कि वृद्धों को वैक्सीन देना मुश्किल क्यों है, इसके लिए हमें उनके शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को समझना होगा। वो समझाते हैं कि बूढ़े लोगों को इम्यूनोसेनेसेंस- यानी इम्यून सिस्टम के बूढ़े हो जाना का खतरा रहता है। हमारे शरीर के किसी भी दूसरे अंग की तरह हमारी रोग प्रतिरक्षा प्रणाली में भी बुढ़ापे के लक्षण देखे जा सकते हैं। उम्र के साथ कई कोशिकाएं अपना काम सही तरीके से नहीं कर पातीं।
प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत जटिल होती है, इसमें कई कोशिकाएं एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं। अगर इस सिस्टम में कहीं पर कुछ काम नहीं कर रहा, तो इसका असर पूरे सिस्टम के लड़ने की प्रक्रिया पर पड़ता है। अगर आपको कोई कीटाणु या विषाणु संक्रमित करता है, तो रोग प्रतिरक्षा प्रणाली की पहली लेयर उस पर हमला करना शुरू करती है। सांस की बीमारी के लिए ये काम फेफड़े, श्वास की नली या नाक की मदद से किया जा सकता है। व्हाइट ब्लड सेल या मैक्रोफेजेस, विषाणु पर हमला करते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं। जब मैक्रोफेजेस इन्हें तोड़ देते हैं, उसके बाद वो इन्हें दूसरे इम्यून सेल को देते हैं, जिन्हें टी-सेल कहते हैं। ये प्रतिरक्षा प्रणाली की 'याददाश्त' की तरह काम करते हैं।
टी-सेल खुद विषाणु को नहीं देख सकते, लेकिन ये उसे पहचान कर याद रखने का काम करते हैं ताकि अगली बार वही विषाणु हमला करे तो वो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सचेत कर सकें। ये अगले लेयर को सक्रिय करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाते हैं।
कैसे काम करती है रोग प्रतिरक्षा प्रणाली?
टी-सेल्स कई तरह के होते हैं। किलर टी-सेल या साइटोटॉक्सिन हमारे शरीर में मौजूद कोशिकाओं पर हमला करते हैं ताकि उन कोशिकाओं को निकाला जा सके, जो विषाणु से संक्रमित हैं। ये उनके फैलने की गति को कम करते हैं। हेल्पर टी-सेल, बी-सेल की मदद करते हैं, जो दूसरे तरह की प्रतिरक्षा प्रणाली हैं। बी-सेल खुद ही विषाणु से लड़ सकते हैं, लेकिन सही तरीके से काम करने के लिए उन्हें टी-सेल की जरूरत होती है। बी-सेल एंटीबॉडी पैदा करते हैं, लेकिन सबसे कारगर एंटीबॉडी पैदा करने के लिए उन्हें टी-सेल के साथ एक जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
टीकाकरण का लक्ष्य कीटाणु या विषाणु के संपर्क में आने से पहले हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावी एंटीबॉडी का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करना है। वैक्सीनोलॉजिस्ट के लिए समस्या यह है कि बुजुर्गों में उम्र अधिक होने के कारण इन सभी कोशिकाओं के बीच का नाजुक संतुलन बाधित हो जाता है।
कैसी होती है वृद्ध व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली?
इन्सब्रुक विश्वविद्यालय के बिरट्ज वेनबर्गर कहते हैं, 'वे साइटोकाइन्स (प्रोटीन जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं के बीच संचार में सहायता करते हैं) के एक अलग सेट का उत्पादन करते हैं। मुझे लगता है कि एक महत्वपूर्ण मुद्दा, जिस पर ध्यान देना जरूरी है, वो ये है कि कोशिकाओं में से कोई भी अपने दम पर कार्य नहीं करता है।'
यदि मैक्रोफेजेस ठीक से नहीं काम नहीं कर रहा है, तो इससे टी-सेल भी ठीक से सक्रिय नहीं होगा। बी-सेल से कोशिकाओं को कम मदद मिलेगी और कम एंटीबॉडी का असर प्रतिक्रिया पर हो सकता है। वेनबर्गर कहते हैं, 'इस बात को ध्यान में रखना होगा कि प्रतिरक्षा प्रणाली के सभी अलग-अलग हिस्सों को कैसे एक साथ काम करने के लिए तैयार करना है।'