प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस से देश के सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों से कहा है कि वो टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को शीर्ष प्राथमिकता दें। भारत में संक्रमण के रोजाना आ रहे मामलों में सितंबर के मध्य से कमी आई है, लेकिन इस बात की चिंता जताई जा रही है कि अलग-अलग टेस्टिंग रणनीति बीमारी के खिलाफ लड़ाई में बाधा बन सकती है।
Coronavirus: क्या भारत की टेस्ट और ट्रेसिंग रणनीति काम कर रही है? विस्तार से जानिए इसके बारे में सबकुछ
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माना जाता है कि फॉल्स निगेटिव (जहां संक्रमित लोगों की पहचान नहीं हो पाती) की वजह से आरएटी टेस्ट 50 फीसदी नतीजे गलत दे देता है, हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये टेस्ट वायरस हॉटस्पॉट वाले इलाकों में उपयोगी हो सकते हैं। हरियाणा की अशोका यूनिवर्सिटी में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ, प्रोफेसर गौतम मेनन कहते हैं, 'मामले की पहचान करने की क्षमता कम संवेदनशील आरएटी टेस्ट और गोल्ड स्टैंडर्ड पीसीआर टेस्ट के सापेक्ष मिश्रण पर निर्भर करती है।' सिर्फ भारत ही इस टेस्ट का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, लगातार आ रही संक्रमण की लहरों से जूझ रहे कुछ यूरोपीय देश भी रैपिड टेस्टिंग करने लगे हैं।
क्या पूरे देश में एक समान टेस्टिंग हो रही है?
नहीं, ऐसा नहीं है। भारत में संक्रमण की सबसे ज्यादा मार जिस राज्य पर पड़ी है, वो है महाराष्ट्र. देश के कुल मामलों में से 17 फीसदी महाराष्ट्र में ही सामने आए हैं। महाराष्ट्र की तुलना में कम आबादी वाले कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में कोरोना वायरस के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। लेकिन बड़ी आबादी वाले दो राज्यों - उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थिति ऊपर लिखे राज्यों से काफी बेहतर है। यहां पुष्ट मामलों का अनुपात कम यानी 2.9 और 1.6 फीसदी है।
टेस्टिंग के आंकड़े बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश (और कुछ दूसरे राज्य) में कुल टेस्ट में से 50 फीसदी से भी कम पीसीआर टेस्ट से हो रहे हैं। इसका मतलब है कि कई मामलों की पहचान नहीं हो पा रही है। महाराष्ट्र में करीब 60 फीसदी टेस्ट पीसीआर टेस्ट थे। हालांकि वो राज्य की राजधानी मुंबई में रैपिड टेस्ट का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। और तमिलनाडु राज्य में पूरी तरह से पीसीआर टेस्ट हुए हैं, इसका मतलब हो सकता है कि वहां संक्रमण के प्रसार का सबसे सटीक आइडिया मिल रहा है।
राज्यों में भी हर जगह एक समान टेस्टिंग नहीं
ऐसे सबूत मिलते हैं कि राज्य अपने ज्यादा आबादी वाले इलाकों में पर्याप्त टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं, जहां संक्रमण की दर कहीं ज्यादा हो सकती है। 30 नवंबर तक उत्तर प्रदेश के कुल मामलों में से 13 फीसदी मामले राजधानी लखनऊ में मिले। हालांकि राज्य में जितने टेस्ट हुए उसके छह फीसदी से भी कम यहां हुए थे। राज्य में कानपुर जिले में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए, लेकिन वहां हुए कुल टेस्ट में से तीन फीसदी से भी कम कानपुर में हुए थे।