मई में जब इस बात का एलान हुआ कि कोविड-19 के मरीजों पर एक दवा असरदार साबित हो रही है तो इसे लेकर बड़ी उम्मीदें पैदा हो गई थीं। ये दवा रेमडेसिविर थी। यह अमरीकी फार्मा कंपनी गिलियड की एक एंटीवायरल दवा है। शुरुआती जांच से पता चला था कि यह दवा कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों को जल्दी ठीक कर सकती है। इस एलान के बाद पूरी दुनिया के विशेषज्ञों, डॉक्टरों और राजनेताओं ने खुद से एक सवाल पूछा। यह सवाल था कि गिलियड इस दवा के लिए कितने पैसे वसूलेगी?
कोरोना वायरस: हद से ज्यादा महंगी क्यों है रेमडेसिविर, इस दवा के बारे में क्या आप ये बातें जानते हैं?
गिलियड ने एक बयान में कहा कि विकासशील देशों में कंपनी जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियों के साथ बातचीत कर रही है ताकि इन देशों में दवा काफी कम दाम में मुहैया कराई जा सके। हालांकि, इसमें कीमत के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया। गिलियड के सीईओ डैनियल ओ'डे ने बयान में कहा, "हम रेमडेसिविर की कीमत तय करने को लेकर हमारे ऊपर मौजूद बड़ी जिम्मेदारी को समझते हैं। काफी सावधानी, लंबा वक्त और चर्चा करने के बाद हम अपना फैसला साझा करने के लिए तैयार हैं।" ये फैसला हालांकि, एक बड़े तबके की आलोचना का शिकार हुआ।
इन लोगों का मानना था कि ऐसे वक्त में जबकि दुनिया एक स्वास्थ्य आपातकाल से गुजर रही है, इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा की इतनी ऊंची कीमत तय करना एक अपराध है। पीटर मेबार्डक ग़ैरसरकारी संगठन 'पब्लिक सिटिजन' के 'एक्सेस टू मेडिसिंस' प्रोग्राम के निदेशक हैं। 'पब्लिक सिटिजन' का मुख्यालय वाशिंगटन में है।
पीटर कहते हैं, "घमंड और आम लोगों के प्रति उपेक्षा दिखाते हुए गिलियड ने एक ऐसी दवा की कीमत हजारों डॉलर तय कर दी है जिसे आम लोगों के बीच होना चाहिए।" जानकारों का कहना है कि दवा कंपनियों को मुनाफा कमाने का पूरा हक है क्योंकि उन्हें किसी दवा को विकसित करने और उसका उत्पादन करने पर भारी पूंजी निवेश करनी पड़ती है।
मैड्रिड में कैमिलो जोस सेला यूनिवर्सिटी में फार्माकोलॉजी के प्रोफेसर फ्रैंसिस्को लोपेज मुनोज कहते हैं, "आपको इस तथ्य के साथ शुरू करना पड़ता है कि दवाओं का विकास एक बेहद महंगा सौदा होता है। खोज से लेकर मार्केट में आने तक किसी दवा की औसत कीमत करीब 1.14 अरब डॉलर बैठती है। इसके अलावा इसमें वक्त भी बहुत लगता है। किसी दवा को विकसित करने में 12 साल तक का वक्त लग सकता है और स्टडी की जा रही हर 5,000 दवाओं में से केवल एक ही बाजार तक पहुंच पाती है। इसके साथ ही हमें पेटेंट के एक्सपायर होने को भी देखना पड़ता है। मार्केट में आने के 20 साल बाद दवा का पेटेंट खत्म हो जाता है।"
हेपेटाइटिस-सी से कोरोना तक
हालांकि, रेमडेसिविर के साथ मामला थोड़ा अलग है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कोई नई दवा नहीं है। न ही गिलियड ने इसे खासतौर पर कोविड-19 के लिए विकसित किया है। शुरुआत में इस दवा को हेपेटाइटिस-सी के लिए विकसित किया गया था। जब यह पाया गया कि यह हेपेटाइटिस पर बेअसर है तो इसे इबोला वायरस के इलाज के लिए आजमाया गया, लेकिन यह वहां भी काम नहीं आई और गिलियड ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इस साल की शुरुआत में कोविड-19 के फैलने के बाद गिलियड ने इस दवा को फिर से टेस्ट करने और इसे कोरोना वायरस के खिलाफ आजमाने का फैसला किया। इन नए क्लीनिकल ट्रायल्स पर अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने पैसा लगाया था। यानी कि ये करदाताओं का पैसा था। इसी वजह से विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना महामारी के दौर में आम लोगों को यह दवाई उत्पादन की लागत पर मुहैया कराई जानी चाहिए।
हद से ज्यादा महंगी
गिलियड ने रेमडेसिविर की उत्पादन लागत का खुलासा नहीं किया है, लेकिन क्लीनिकल एंड इकनॉमिक रिव्यू इंस्टीट्यूट (आईसीईआर) के विश्लेषण से पता चला है कि प्रति मरीज 10 दिन के इलाज के लिए इस दवा की मैन्युफैक्चरिंग की लागत करीब 10 डॉलर बैठती है। लेकिन, गिलियड की तय की गई नई कीमत के हिसाब से रेमडेसिविर अपनी पेरेंट कंपनी के लिए 2020 में 2।3 अरब डॉलर की कमाई कर सकती है। रॉयल बैंक ऑफ कनाडा ने इस बात का आकलन किया है।