वर्क फ्रॉम होम के दौरान पूर्वी अपनी निजी और पेशेवर जिंदगी के बीच तालमेल बिठाने के लिए लगातार कोशिश कर रही हैं। वो कहती हैं, "बेशक घर से काम करना मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि अब धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ रही है। मेरा ऑफिस काफी दूर है इसलिए मैं वहां जाकर काम नहीं करना चाहती लेकिन मैं घर से भी काम नहीं करना चाहती। मुझे ठीक से काम करने के लिए जगह बदलने की ज़रूरत है।" पूर्वी ने अब अपने घर के एक कोने को छोटे से ऑफिस में तब्दील कर दिया है। उन्होंने घर में अपना एक डेस्क, प्रिंटर और इंटरनेट कनेक्शन लगवा लिया है। उनका कहना है कि जिंदगी थोड़ी सामान्य होते ही वो एक को-वर्किंग स्पेस में काम करना शुरू कर देंगी।
कोरोना वायरस: कुछ इस तरह बदल जाएगी हमारे काम-धाम की दुनिया
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ब्रैंड कंसल्टेंट हरीश बिजूर कहते हैं, "बड़े ऑफिस अब छोटी-छोटी यूनिट्स में तब्दील हो रहे हैं। लोग अब बिना चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के काम कर रहे हैं और कइयों के लिए ये अहम का मसला बन रहा है।" लॉकडाउन ने लोगों को उनके घरों में बंद कर दिया है। हरीश कहते हैं, "आजकल लोगों को दो मोबाइल फोन रखना पड़ता है-एक ऑफिस के लिए और एक निजी जिंदगी के लिए। लोगों को अब ऑफिस का कोना बनाने के लिए बड़े घरों की जरूरत पड़ रही है। चूंकि अब यहीं न्यू नॉर्मल है इसलिए प्रिंटर और ऑफिस के लिए बाकी जरूरी चीजों की मांग भी बढ़ गई है।"
समीर जोशी नामी फर्नीचर ब्रैंड गोदरेज इंटीरियो में करते हैं। वो कहते हैं कि ज्यादातर भारतीय घर छोटे होते हैं इसलिए उनमें ऑफिस की चीजें रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती। समीर बताते है कि उनकी कंपनी की वेबसाइट पर कुर्सियों के लिए किए जाने वाले सर्च में 140 फीसदी की बढ़त देखी गई और कुर्सियों के बाद लोगों ने जो चीज सबसे ज्यादा बार ढूंढी है वो है-टेबल। यही वजह है कि गोदरेज ऐसे फर्नीचर को बढ़ावा दे रहा है जो घरों में आसानी से एडजस्ट हो सकें। जैसे कि फोल्डेबल (मोड़ी जा सकने वाली) कुर्सियां और मेजें। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्क फ्रॉम होम सिर्फ काम करने वालों के लिए नहीं बल्कि संस्थानों के लिए भी चुनौती है।
सिक्योरिटी सर्विस कंपनी सिक्योरटेक (Sequretek) के को-फाउंडर पंकित देसाई कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती ये सुनिश्चित करने की है लोग बिना किसी ताकाझांकी के काम कर सके। ये ताकाझांकी डेटा के छेड़छाड़ से लेकर किसी अन्य गोपनीय जानकारी के इधर-उधर होने तक हो सकती है। खासकर जब आपके हाथ में किसी और का डाटा हो तो आपको इसकी सुरक्षा का पूरा ख्याल रखना होता है।" फेसबुक और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों ने पहले से इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया है कि उनका 30-50 फीसदी से ज्यादा स्टाफ दफ्तर न आए। ये व्यवस्था अगर पूरी तरह लागू हो जाती है तो अगले तीन-चार वर्षों में नए कायदे-कानून भी लागू होंगे। यूनिकॉर्न इंडिया वेंचर्स के मैनेजिंग पार्टनर भास्कर मजुमदार कहते हैं, "आने वाले दिनों में एक बड़ा बदलाव ये होने वाला है कि कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को हफ्ते में सिर्फ एक या दो बार आने को कहेंगे और फिर इसी हिसाब से भुगतान करेंगे।"
चूंकि अब घर से काम करना न्यू नॉर्मल बन गया है इसलिए कंपनियां अपने स्टाफ को सुरक्षित रखने के लिए दफ्तरों और काम करने की जगहों में कुछ मूलभूत बदलाव कर रही हैं। कम से कम अभी कुछ दिनों के लिए तो दफ्तरों में कोई भी कर्मचारी साथ-साथ या पास में नहीं बैठेंगे। अभी का जो माहौल है वो कोलैबरेटिव जोन्स बनाने के विचार से बिल्कुल उलट है। कोलैबरेटिव जोन्स का मकसद लोगों को साथ लाना है। अब लोगों को साथ लाने के लिए नए डिजिटल टूल्स की जरूरत है न कि ऐसे जोन्स की। अब दफ्तरों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए ज्यादा जगह बनानी होगी। फिजिकल डिस्टेंसिंग के 'छह फीट दूरी' वाले मानक को देखते हुए भी दफ्तरों में ज्यादा जगह की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही ग्लास और उससे बनी चीजों की मांग बढ़ेगी क्योंकि उन्हें आसानी से साफ और डिसइन्फेक्ट किया जा सकता है। विषाणुरोधी मटीरियल कोटिंग वाली चीजों की मांग भी बढ़ सकती है।