केले का रोचक और दिलचस्प किस्साः आखिर दर्जन में ही क्यों गिने जाते हैं केले, संतरे और आम क्यों नहीं
मैं कई प्रश्नों के उत्तर देने से बचता हूं। विशेषकर बच्चों के या जो बच्चों की तरह मुझपर विश्वास करना चाहते हैं। मैं उनकी विश्वासभंजिता को जिलाये रखना चाहता हूं। उत्तरों पर श्रद्धा लाने के अनेक ढंग-ढर्रे हैं। हर जवाब पर एक-सा भरोसा न लाइए। लेकिन यह कर पाना ज़्यादातर लोगों के सम्भव नहीं। बच्चों के लिए तो सचमुच बहुत मुश्किल है। वह मेरी बात पर आंख-मूंद भरोसा करेगा, इसलिए आंखें मुंदना जहां निश्चित हो, वहां यथासम्भव तार्किक उत्तर देना मुझे सुहाता है। इससे उत्तर की दीर्घजीविता बनी रहती है और उत्तरदायी की भी। सो मैं यही करता हूँ: केलों और किलो के बीच न बन सके रहे सम्बन्ध को उसे समझाने की कोशिश करता हूं।
कहानी केले की
केला एक बड़ा पोषक फल है। ढेर सारे कार्बोहाइड्रेट ( मांड़-शर्करा ), खनिजों और विटामिनों से भरपूर। एक सुपरफूड। मीठा होने के बाद भी रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ने नहीं देता। पेट भी साफ़ रखता है। लेकिन इन सब बातों के बावजूद संसार-भर के केलों में एक विशिष्ट बात साझी है। दुनिया-भर में बिकने वाले लगभग आधे केले कैवेंडिश सबग्रुप के सदस्य हैं। और ये सभी दिखने में आकार-आकृति में लगभग एक-से नज़र आते हैं।
फिर इन सब केलों की पैदावार वैसे नहीं होती, जैसे अन्य पौधों या जीवजन्तुओं की होती है। यौनकर्म इनके जन्म में भूमिका नहीं निभाता। केलों के इन पौधों में परागण के बाद निषेचन नहीं होता: इनकी पैदावार होती है अलैंगिक ढंग से। केले के पौधे के ऑफशूट काटकर उन्हें मिट्टी में लगाया जाता है ताकि फसल ली जा सके। इस तरह से ढेर सारे पौधे एक ही मूल पौधे की सन्तान सिद्ध होते हैं और वह भी एक-जैसे फल पैदा करते हैं।
केले की एकरूपता
आप बाज़ार में दो केलों को उठाकर देखें; उनमें जितनी एकरूपता पाएंगे, उतनी आपको कई फलों-सब्ज़ियों में कदाचित् न मिले। कारण कि विश्व का आधा केला-भण्डार एक ही 'प्रजाति' यानी सबग्रुप का है। साथ ही यह कि उसे लैंगिक प्रजनन से पैदा नहीं किया जा रहा। सो केले का जन्म यौनहीन पादप-उद्भव की कथा है। अब यौनिक बनाम अयौनिक वंश-वृद्धि के अपने लाभ हैं और अपनी हानियां भी।