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कारगिल का एक योद्धा, जो 'मरने' के बाद जी उठा था, जानिए पुनर्जन्म से लेकर वर्ल्ड रिकॉर्ड तक की गाथा
Sat, 20 Jul 2019 02:01 PM IST
Pranjal Dixit
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: Pranjal Dixit
Updated Sat, 20 Jul 2019 02:01 PM IST
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मेजर डीपी सिंह
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
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कारगिल युद्ध को 20 साल गुजर चुके हैं। ऐसे में आपको एक ऐसे वीर योद्धा की गाथा बताने जा रहे हैं, जो मरने के बाद जी उठे थे और आज एक मिसाल बन चुके हैं। जानिए आखिर कैसे हुआ वीर सपूत का पुनर्जन्म...
मेजर डीपी सिंह
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
इस वीर बहादुर का नाम है मेजर डीपी सिंह। इन्हें फर्स्ट इंडियन ब्लेड मैराथन रनर के नाम से भी पहचाना जाता है। इन्होंने पहले मौत को मात दी और आज वे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं, लेकिन उनके पुनर्जन्म की कहानी दिलचस्प है। डीपी सिंह हर साल 15 जुलाई को अपना पुनर्जन्म दिवस मनाते हैं। अभी वे 45 साल के हो चुके हैं, लेकिन जिंदगी के 19 साल कुछ दिन पहले ही पूरे किए हैं।
मेजर डीपी सिंह
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
कारगिल के युद्ध में डीपी सिंह बुरी तरह से घायल हो गए थे। उनका एक पैर भी कट चुका था। इलाज के दौरान उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, लेकिन वह जी उठे। खुद डीपी सिंह बताते हैं कि 1999 की बात है ये। करगिल युद्ध चल रहा था। एक ब्लास्ट हुआ। आठ किलोमीटर तक मेरे साथी मारे गए उनके शव मेरी आंखों के सामने थे। मैं डेढ़ किलोमीटर ही दूर था। खून में सना हुआ था मैं। एक पैर तो वहीं गंवा चुका था। शरीर पर 40 गहरे घाव थे।
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मेजर डीपी सिंह
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
उन्होंने बताया कि मेरे साथी अपनी जान दांव पर लगाकर मुझे वहां से ले गए। बीच में पाक ऑक्यूपाइड नदी आई। एक साथी को ठीक से तैरना भी नहीं आता था। फिर भी उन्होंने मुझे अस्पताल पहुंचाया। किसी भी क्षण उन्हें गोली लग सकती थी, लेकिन उन्होंने मुझे यूं नहीं छोड़ा। डॉक्टर ने तो मुझे डेड डिक्लेयर कर दिया था। डीपी सिंह कहते हैं कि मेरी किस्मत में जीना लिखा था। उसी दिन एक सीनियर डॉक्टर हॉस्पिटल के दौरे पर थे और उनकी कोशिशों से मेरे शरीर में जिंदगी लौटी। वही से नई जिंदगी शुरू हुई। तब से हर 15 जुलाई को मैं अपना मृत्यु व जन्म दिवस मनाता हूं।
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मेजर डीपी सिंह
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
मेजर कहते हैं कि मैंने इस नई जिंदगी की शुरुआत एक बच्चे की तरह की थी, लेकिन यात्रा कठिन थी। क्योंकि यहां कोई हाथ थामकर चलना सिखाने वाला नहीं था। पर मैंने खुद को सिर्फ जख्मों से उबरा, बल्कि 2009 में कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखा। बता दें कि इसके बाद मेजर ने कृत्रिम पैर के सहारे मैराथन में दौड़ना शुरू किया। 21 किमी हॉफ मैराथन दौड़कर इतिहास बनाया और देश में उनसे पहले किसी ने ऐसा नहीं किया था। वह तीन मैराथन में हिस्सा भी ले चुके हैं।