भुवन चंद्र खंडूड़ी: राजनीति में लाए अटल, बेटे की विरासत तक 30 साल में कैसे बदला सब?
उत्तराखंड के चौथे मुख्यमंत्री रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी को अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में लाए थे। ये 1990 का दौर था। खंडूड़ी सेना से रिटायर हुए थे और दिल्ली का सरकारी घर छोड़कर अपने शहर देहरादून जाने की तैयारी कर रहे थे। उनके बेटे मनीष खंडूड़ी जो कि अब पौड़ी गढ़वाल सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं उस वक्त इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। विजय त्रिवेदी अपनी किताब 'हार नहीं मानूंगा' में लिखते हैं- इस पहाड़ी इलाके में उस वक्त भाजपा के हाल बहुत अच्छे नहीं थे। विधानसभा और लोकसभा किसी भी सीट पर भाजपा की कोई नुमाइंदगी नहीं थी। देश में मंडल कमीशन की वजह से छात्रों के आंदोलन चल रहे थे। छात्र आत्मदाह कर रहे थे जिसे देखकर सेना से रिटायर हुए खंडूड़ी दुखी रहते थे।
कांग्रेस कुछ नहीं कर रही थी और भाजपा मैदान में बहुत आगे नहीं आई थी। मुरली मनोहर जोशी तब भाजपा अध्यक्ष थे। यह तीस साल पुरानी बात है। उस वक्त खंडूड़ी को भाजपा के एक नेता का फोन आया कि तुम वाजपेयी से मिल लो। भाजपा में इस वक्त उपेक्षा झेल रहे खंडूड़ी ने तब कहा था- 'क्या जरूरत है?' नेता ने कहा कि एक बार मिलने में क्या बुराई है? जब खंडूड़ी तय वक्त पर वाजपेयी से मिलने गए तो पता चला कि उनके साथ देहरादून जाना है। देश में उस वक्त लोकसभा चुनाव का एलान हो चुका था।
मां कांग्रेस की सक्रिय सदस्य और मामा थे कांग्रेस के कद्दावर नेता
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का परिवार राजनीतिक परिवार था। उनके मामा हेमवन्ती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे। मां कांग्रेस में सक्रिय रहीं और मामा के बेटे विजय बहुगुणा भी तब तक सक्रिय राजनीति में आ गए थे। जो अब भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। 30 सालों में राजनीति के कई समीकरण बदल चुके हैं। हालांकि खंडूड़ी अब भी खुद को सच्चा भाजपाई ही बता रहे हैं। विजय त्रिवेदी की किताब बताती है कि वाजपेयी के साथ उस वक्त देहरादून गए खंडूड़ी पहले तो मंच के पीछे बैठे रहे और फिर वाजपेयी के कहने पर भाषण दिया। बाद में भाजपा के तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र का गढ़वाल से चुनाव लड़ने का आदेश मिला। उस वक्त खंडूड़ी की न तो चुनाव लड़ने की तैयारी ही थी और न ही कोई इरादा। ऊपर से ममेरे भाई विजय बहुगुणा के भी गढ़वाल से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के आसार थे। खंडूड़ी ने साफ इंकार कर दिया कि वह अपने ममेरे भाई के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेंगे। कांग्रेस ने विजय बहुगुणा की जगह सतपाल महाराज को टिकट दिया और खंडूड़ी, सतपाल महाराज को हराकर लोकसभा पहुंचे।
भुवन चंद्र खंडूड़ी की गिनती पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसेमंदों में होती है। पहली बार लोकसभा पहुंचने के दो साल के भीतर ही खंडूड़ी को पार्टी का मुख्य सचेतक बना दिया गया। 1996 के लोकसभा चुनाव में खंडूड़ी को हार का सामना करना पड़ा। 1999 में अटल बिहारी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बनाया गया। इस दौर में देश में सड़कों की शक्ल बदलने और हाईवे बनाने का काम हुआ जिसके लिए खंडूड़ी की आज तक प्रशंसा होती है। कहा जाता है कि वाजपेयी का खंडूड़ी पर इतना भरोसा था कि उन्हें काम करने की पूरी आजादी मिली हुई थी। 17 साल बाद एक बार फिर 2007 में भाजपा को खंडूड़ी को देहरादून भेजने की जरूरत महसूस हुई। अब तक उत्तराखंड को बने सात चाल हो चुके थे और सूबे में भाजपा के अंदर गुटबाजी जोरों पर थी। मैदान में कोश्यारी एवं निशंक गुट थे और दिल्ली तक प्रदर्शन करने के बाद भी सूबे की कमान खंडूड़ी के हाथों में ही आई।
2007 से लेकर 2009 तक खंडूड़ी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। यह वही दौर था जब वाजपेयी के स्वास्थ्य खराब रहने लगा था और आडवाणी एवं सुषमा समेत कई बड़े नेता खंडूड़ी को हटाने के पक्ष में आए और सूबे की कमान रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों में आ गई। जब सूबे में भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए तो एक बार फिर केंद्रीय नेतृत्व को खंडूड़ी को फिर से देहरादून भेजने की जरूरत महसूस हुई और 2011 में उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया। साल 2014 में मोदी लहर की वजह से भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो खंडूड़ी को रक्षा मामलों की संसदीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि सारा खेल इसके बाद से उस वक्त गड़बड़ हुआ जब सवाल उठाने के बाद खंडूड़ी को हटा दिया गया ।