पांच साल पहले मोदी लहर ने लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान को बड़ी आसानी से संसद पहुंचा दिया था, लेकिन इस बार जातीय समीकरण में हुए बदलाव के कारण उनकी राह उतनी आसान नहीं दिख रही है। जमुई में 11 अप्रैल को मतदान हो चुका है। चिराग का मुकाबला रालोसपा उम्मीदवार भूदेव चौधरी से था। इस बार का चुनाव चिराग के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
आगे पढ़िए चिराग पासवान का राजनीतिक करियर और जमुई की जमीनी सच्चाई।
36 वर्षीय चिराग पासवान ने अपने करियर की शुरुआत बॉलीवुड में अभिनय से की थी। उन्हें समीक्षकों की वाहवाही तो मिली लेकिन फिल्म बाक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही। इसके बाद वह राजनीति में आए और 2014 में जमुई लोकसभा सीट से करीब 80 हजार मतों से विजयी हुए थे। जमुई लोकसभा क्षेत्र तीन जिलों मुंगेर, जमुई और शेखपुरा में फैला हुआ है और इसमें विधानसभा के छह क्षेत्र आते हैं।
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प्रधानमंत्री मोदी के साथ चिराग पासवान
उम्मीद जताई जा रही है कि जदयू प्रमुख और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजग में शामिल होने के कारण चिराग को इस बार को महादलितों का समर्थन मिला होगा। नीतीश कुमार सरकार ने 2007 में दलित समूहों में सबसे ज्यादा निर्धन लोगों को महादलित नाम दिया था और उनके कल्याण के लिए विशेष योजनाओं की शुरुआत की थी।
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Narendra Modi, Ramvilas Paswan, Chirag
- फोटो : PTI
चुनाव के पहले ही चिराग को कड़ी टक्कर का आभास हो गया था। शायद यही वजह रही होगी कि वह 11 अप्रैल के पहले कई दिनों से अपने क्षेत्र में दिनरात प्रचार कर रहे थे। इस बार नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह जैसे स्टार प्रचारकों ने भी उनके पक्ष में जमकर प्रचार किया है।
2008 में हुए परिसीमन के बाद यह क्षेत्र अस्तित्व में आया और उसके बाद हुए पहले आम चुनाव में भूदेव चौधरी विजयी रहे थे। पासवान अपनी पार्टी के नेता के रूप में उभरे हैं। उनके पिता रामविलास पासवान ने लगभग दो दशक पहले इस पार्टी का गठन किया था। उनके क्षेत्र के मतदाता केंद्रीय विद्यालय, एक मेडिकल कॉलेज, गोद लिए गए गांव तक सड़क संपर्क, एक नयी रेलवे लाइन आदि को चिराग की उपलब्धियों के रूप में स्वीकार करते हैं।