अक्षय कुमार की वह प्रेस कांफ्रेस तो याद होगी आपको जिसमें वह अपने शरीर में आग लगाकर स्टेज पर प्रकट हुए। वादा किया गया कि वह प्राइम वीडियो के लिए एक बहुत बड़ा शो लाने वाले हैं। ये शो अब अगले साल आएगा। इस शो को बनाने वाली कंपनी एबुंडेंशिया उससे पहले प्राइम वीडियो पर ही ब्रीद 2 ला चुकी है, अब शकुंतला देवी लेकर आई है। शकुंतला देवी का नाम हमारी पीढ़ी ने बचपन में सुना। हमारे बाद की पीढ़ी ने उड़ते उड़ते सुना और हमसे पहले की पीढ़ी ने इसलिए सुना क्योंकि शकुंतला देवी ने सन 80 में इंदिरा गांधी के खिलाफ मेडक से चुनाव लड़ा था। और, सन 80 में ही शकुंतला देवी ने 28 सेकंड में तेरह तेरह अंकों वाली संख्या का गुणनफल निकालकर कंप्यूटर को मात दे दी थी। वैदिक गणित देश में यहीं से फिर से चर्चा में आई।
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शकुंतला देवी
- फोटो : ट्विटर
शकुंतला देवी को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए बनाया गया। फिल्म को ओटीटी पर देखने के बाद सवाल उठ सकता है कि इसे सिनेमाघरों में देखने कितने लोग आते क्योंकि पूरे लॉकडाउन एवेंजर्स सीरीज की फिल्में, टोगो, कोको या इंटरस्टेलर देखने में व्यस्त रही पीढ़ी को शकुंतला देवी का ट्रेलर भी गुगली सा लगा। तमाम लोगों ने ये फिल्म इसलिए देखी कि जरा समझा जाए आखिर शकुंतला देवी ये सब करती कैसे थीं? या फिर कि उनके पिता इतने लालची क्यों थे कि एक बेटी की कमाई का पैसा इकट्ठा करने के चक्कर में दूसरी बेटी का इलाज ही नहीं कराया? समझना ये भी जरूरी था कि आखिर किसने शकुंतला देवी को इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया होगा और आखिर ऐसा क्या था कि शकुंतला ने अपने ही पति को समलैंगिक बताकर किताब लिख डाली? शकुंतला के तिलिस्म में बसे ऐसे सवाल तमाम हैं, लेकिन फिल्म शकुंतला देवी इन सारे सवालों से बचकर निकल जाती है।
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शकुंतला देवी
- फोटो : सोशल मीडिया
निर्देशक अनु मेनन की फिल्म शकुंतला देवी पिछली सदी के चौथे दशक में शुरू होती है और आज के समय तक आती है। ये कहानी बताई गई है शकुंतला की लंदन में रहने वाली बेटी अनुपमा बनर्जी के नजरिये से। बचपन में ही बड़ी बड़ी संख्याओं का घनमूल चुटकियों में निकाल देने वाली शकुंतला की विद्या घरवालों के लिए पैसे कमाने का जरिया बनती है तो वह एलान करती है कि घर की स्वामी अब वह है। शहर का शोहदा उसे अपना टाइमपास बनाने की कोशिश करता है तो वह उसे गोली मार देती है। गनीमत समझो कि गणित की तरह शकुंतला का निशाना अचूक नहीं था। लंदन में वह अपना शो बिजनेस खड़ा करती है। मोहब्बत को किनारे करती है और कोलकाता के एक आईएएस पर इसलिए फिदा हो जाती है क्योंकि उसे एक सुंदर और तेज दिमाग बच्चा चाहिए। बात वह मजाक में कहती है कि उसे हसबैंड नहीं बेबी चाहिए लेकिन आगे की कहानी यही साबित कर जाती है।
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शकुंतला देवी
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तो फिल्म शकुंतला देवी क्या है? ये हिंदी सिनेमा का मशहूर शख्सीयतों पर फिल्म बनाने का उल्लासोन्माद (Euphoria) है। इस फिल्म को देखने के बाद दो दिन या कम से कम एक दिन इस पर सोचना जरूरी है, इसकी समालोचना करने के लिए। फिल्म देखकर भी यूफोरिया ही होता है लेकिन अगले दिन समझ आता है कि ये गैंग्स ऑफ वासेपुर में रामाधारी सिंह के संवाद का एक और कनफर्मेशन ही है। फिल्म नहीं बताती कि शकुंतला ये सब कैसे कर लेती थीं। दो डॉक्टर बैठकर उनका सीटी स्कैन समझाते हैं, लेकिन जब शकुंतला को उनका कहा समझ नहीं आता तो दर्शकों को भला क्या खाक आएगा? जिस माता से नफरत करते करते वह अपनी बेटी की नफरत का केंद्र बन गई, उससे उसका रिश्ता थोड़ा और दिखता तो शकुंतला का मानवीय पहलू और संवेदनशील हो सकता था।
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शकुंतला देवी
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अनु मेनन ने फिल्म की पूरी कहानी को शकुंतला देवी की बेटी के नजरिए से लिखा और निर्देशित किया है। समस्या यहां वही है जो पहले शकुंतला और फिर अनुपमा के साथ होती है कि वह अपनी मां को एक महिला के तौर पर देखने से चूक जाती हैं। फिल्म भी शकुंतला देवी को सिर्फ उस शकुंतला देवी के तौर पर देखती है जो उनकी बेटी दिखाना चाहती है। एक फिल्म निर्देशक से इससे ज्यादा की उम्मीद बनती है लेकिन निर्देशक फिल्म शुरू होने से पहले ही बता देती है कि ये फिल्म शकुंतला देवी पर बनी ना तो बायोपिक है और ना ही डॉक्यूमेंट्री। और, फिल्म बनाने वाली टीम ने इसमें अपने हिसाब से क्रियात्मक छूट ली है।