Movie Review: राम सिंह चार्ली
स्टारकास्ट: कुमुद मिश्रा, दिव्या दत्ता, आकर्ष खुराना आदि
निर्देशक: नितिन कक्कड़
ओटीटी: सोनी लिव
रेटिंग: ***
मौजूदा पीढ़ी के बच्चों को तो खैर चिड़ियाघर का मतलब भी तभी समझ आता है जब उन्हें स्कूल की तरफ से जबरदस्ती वहां ले जाया जाता है तो भला सर्कस वे नहीं समझते हैं तो इसमें उनका दोष नहीं है। सर्कस एक तरह से जीवन का स्वाद बदलने के लिए देखा जाता था। जब इंसान सिनेमा और नौटंकी से बोर हो जाता तो देखने निकलता कुछ ऐसा जो साक्षात भी हो रहा हो और जिसमें रोमांच भी हो। फिर मेनका गांधी का आंदोलन शुरू हुआ। जानवरों से प्रेम करने का अभियान शुरू हुआ और सर्कस बंद हो गए। सिनेमा में भी अब जानवरों को दिखाना हो तो तमाम अनुमतियां लेनी होती हैं या फिर विदेश में जाकर शूटिंग करनी होती है। राम सिंह चार्ली की कहानी इन्हीं लकीरों के बीच बची खाली जगहों से होकर गुजरती है।
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राम सिंह चार्ली
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बचपन और अध्यात्म दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर उम्र में बड़ा होने के बाद भी आपमें अपने सपनों को पाने की जिद है। चेहरे पर मासूमियत बाकी है। दिल में कुछ कर गुजरने का हौसला बरकरार है तो जीवन चल रहा है। थक हारकर हिम्मत छोड़ देने वालों के लिए जीवन नहीं है। राम सिंह चार्ली की कहानी भी ऐसी ही है। उसका बेटा चिंटू उम्र से पहले ही बड़ों सी बातें करने लगा है, उसे अपने पिता का दर्द पता तो है लेकिन चाहकर भी वह उसे बांट नहीं पाता। वह अपने पिता के संघर्ष का साक्षी भी है और सहभोगी।
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दिव्या दत्ता
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राम सिंह की असल पहचान उसका उपनाम चार्ली है। चार्ली है तो राम सिंह। वो नहीं है तो कुछ भी नहीं है। मोबाइल, वीडियोगेम में अटक चुकी दुनिया में अब सर्कस के लिए न तो समय है और न ही जगह। डेरा उठता है। लोग बिछड़ते हैं। कोई किसी दिशा में तो किसी दिशा में भटक जाता है। सबको सुबह शाम के चूल्हे की चिंता है। लेकिन राम सिंह को चार्ली की चिंता है।
राम सिंह को काम तो मिलता है लेकिन संतोष नहीं मिलता। कलाकार पैसे के लिए तो काम इसलिए करता है कि उसे घर भी चलाना होता है। लेकिन, उसके भीतर के कलाकार को अपना हुनर भी दिखाना होता है। जिंदगी के इम्तिहान में वह दोबारा बैठता है और इस बार वह प्यादे से मात खा जाता है। मुसीबतें बढ़ती हैं। उसे अपनी दो बीघा तो नहीं लेकिन कलाकारी से ज्यादा जिम्मेदारी की जमीन बचानी होती है। वह रिक्शा खींचता है। पसीना बहाता है। लेकिन, अपना सपना नहीं भूलता।
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कुमुद मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘रामसिंह चार्ली’ इस वीकएंड का एक ऐसा एहसास है जो आपको ‘परीक्षा’, ‘मी रक्सम’ और ‘क्लास ऑफ 83’ के बहाव में एक नई पतवार देता है। फिल्म की जान है इसके कलाकारों का जीवंत अभिनय। आदिल हुसैन, दानिश हुसैन, बॉबी देओल की पंगत में नया नाम जुड़ा है कुमुद मिश्रा का। वह भले बलराज साहनी के दर्जे के कलाकार न हों लेकिन कोशिश उन्होंने यहां वैसी ही की हैं और काबिल-ए-तारीफ की है। दिव्या दत्ता के चेहरे की मासूमियत जब दर्द का भभका बनकर अदाकारी में बदलती है तो एक टीस से मन में कहीं छोड़ जाती है। दिव्या का ये अभिनय यादगार रहेगा। दोनों जब साथ होते हैं तब तो कहना ही क्या।
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राम सिंह चार्ली
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तकनीकी तौर पर भी फिल्म अच्छी बन पड़ी है। ‘मित्रों’, ‘जवानी जानेमन’ और ‘नोटबुक’ के पहले की इस फिल्म में नितिन कक्कड़ ने एक बार फिर ये दिखाया है कि मानवीय संवेदनाओं पर उनकी पकड़ अच्छी है और उम्दा अदाकारी करने वाले सितारे अगर उन्हें मिलें तो वह कुछ बड़ा और बेहतर रचने का माद्दा रखते हैं। फिल्म ‘राम सिंह चार्ली’ दिखती भी अच्छी है, सिनेमैटोग्राफी कमाल की है और फिल्म का संपादन भी उम्दा है। संगीत पक्ष थोड़ा मध्यम जरूर है लेकिन कहानी के हिसाब से नितिन को यही उम्दा लगा होगा। फिल्म के संवाद और मांजे जाने चाहिए थे, इसका इमोशन बेहतर तरीके से उभारने के लिए।