मूवी रिव्यू: घोस्ट स्टोरीज
कलाकार: जान्हवी कपूर, सुरेखी सीकरी, शोभिता धूलिपाला, मृणाल ठाकुर, अविनाश तिवारी आदि
निर्देशक: जोया अख्तर, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी और करण जौहर
निर्माता: रॉनी स्क्रूवाला
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
देश में करोड़ों लोग जब नए साल के स्वागत में फुलझड़ियां जला रहे हों, पार्टियों में डीजे से अपना वाला गाना बजाने की जिद कर रहे हों और आप रात के 12 बजे से ढाई बजे तक बत्तियां बुझाकर बड़े वाले टीवी पर कुछ ऐसा देखने की उम्मीद लगाए बैठे हों जिससे साल की शुरुआत थोड़ी चौंकाने वाली हो, तो तय है कि आप घोस्ट स्टोरीज देख रहे हैं। अनुराग कश्यप और करण जौहर अपनी फिल्मों का तंबू खूब बड़ा तानते हैं। लस्ट स्टोरीज के बाद एक बार फिर उनके साथ जोया अख्तर और दिबाकर बनर्जी भी हैं। लेकिन, नतीजा? आओ इसका पता लगाएं।
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घोस्ट स्टोरीज
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घोस्ट स्टोरीज की पहली कहानी जोया अख्तर ने निर्देशित की है। जान्हवी कपूर को धड़क के बाद किसी दूसरी फिल्म में देखने की उम्मीद तमाम लोग लगाए बैठे होंगे। जान्हवी सिर पर मंडराते कोऔं के बीच अपने बॉयफ्रेंड से फोन पर बतियाती दिखती हैं और उसके बाद पहुंच जाती हैं एक बुजुर्ग बीमार महिला की देखभाल करने जो घर में अकेले रहती है। बुढ़िया को नींद की गोली खिलाकर ये नर्स अपने शादीशुदा बॉयफ्रेंड के साथ इंटीमेट होना चाहती है। लेकिन, जिस महिला को वह अभी अभी नींद की गोली खिलाकर आई है, वह सोई नहीं हैं। घोस्ट स्टोरीज की पहली कहानी मौसम सही बनाती है। जान्हवी कभी लिपस्टिक लगाकर तो कभी उसे पोंछकर हॉरर फिल्मों में उत्तेजना वाला रंग भरने की कोशिश करती हैं और सुरेखा सीकरी तो हैं ही दमदार कलाकार। लेकिन, जोया? कहीं से लगता नहीं कि ये कहानी उस निर्देशक की है जिसकी पिछली फिल्म गली बॉय है।
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Ghost Stories
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दूसरा नंबर अनुराग कश्यप का है। अनुराग हॉरर गढ़ने के लिए स्क्रीन से रंग गायब करते हैं। शोभिता के गर्भवती होने के आसपास सिनेमा गढ़ते हैं। अपने गुरु रामगोपाल वर्मा की तरह एक बच्चा भी कहानी के केंद्र में रखते हैं। लेकिन, कहानी जहां से शुरू होती है, वहीं पर अटक जाती है। इस कहानी में भी कौआ है। गर्भधारण से लेकर मां बनने की तरकीबें सिखाती किताबें हैं। रिश्तेदारों से चिढ़ता एक कामकाजी पति है और हैं तमाम सारी गुड़िया। कुछ नहीं है तो वह है कायदे की कहानी। अनुराग की कहानी आपका इम्तिहान लेती है कि क्या हॉरर के नाम पर आप वीभत्सता देखने को तैयार हैं? फिल्म का ये हिस्सा कोई असर नहीं छोड़ पाता है। शोभिता डराती कम हैं घिन ज्यादा पैदा करती हैं। फिर भी उम्मीद बनी रहती है कि अगली दो कहानियों में ये कसर पूरी हो जाएगी।
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घोस्ट स्टोरीज
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तीसरी कहानी हिंदी सिनेमा में जॉम्बी सिनेमा (चलती फिरती लाशों वाला सिनेमा) को स्थापित करने की गो गोवा गॉन के बाद की नई कोशिश हैं। दिबाकर बनर्जी अपनी पहली फिल्म खोसला का घोसला के 13 साल बाद भी वनवास में ही हैं। सिनेमा उनके हाथ से छिटक चुका है। कुछ नया करने के चक्कर में वह पुराना भी भूल चुके हैं। एक गांव में दो बच्चे हैं जो आदमखोर बन चुके अपने पिताओं से बचने की कोशिश में हैं। नई नौकरी के लिए यहां आया एक शहरी इनके बीच में फंस जाता है। एक घटिया कहानी पर बनी वाहियात सी दिखती शॉर्ट फिल्म को घोस्ट स्टोरीज का तीसरा हिस्सा बना दिया गया है। फिल्म सब्र की सीमा का इम्तिहान लेती है और मैं बार बार घड़ी की तरफ देखता रहता हूं कि रात के पौने दो बजे ये हो क्या रहा है?
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घोस्ट स्टोरीज
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खैर, मामला आखिरी कहानी तक पहुंचता है, इस बार डराने की जिम्मेदारी उन करण जौहर की है जो पिछले साल स्टूडेंट ऑफ द ईयर और कलंक जैसी फिल्मों से दर्शकों को डरा चुके हैं। मृणाल ठाकुर यहां एक ऐसी युवती के किरदार में हैं जिसकी शादी अपनी गुजर चुकी दादी को देख सकने वाले लड़के से होती है। कभी खुशी कभी गम बनाने वाले करण जौहर पांच वाला अनुराग कश्यप बनने को बेकरार दिखते हैं। मृणाल ठाकुर सुपर 30 और बाटला हाउस की मेहनत के कपड़े उतारती दिखती हैं। अविनाश तिवारी अपना करियर शुरू होने से पहले ही उस पर माठा डालते दिखते हैं। और, कहानी बिना एक बार भी चौंकाए या डराए खत्म हो जाती है।