निर्देशक पायल कपाड़िया का नाम अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में खूब है। उनकी मां नलिनी मलानी की गिनती देश की शुरुआती वीडियो आर्टिस्ट्स में होती है। पायल ने कान में ग्रां प्रि पुरस्कार जीतने वाली अपनी फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ अपनी नानी को समर्पित की है। अगले हफ्ते ये फिल्म भारत में रिलीज हो रही है। पायल से ये खास बातचीत की है ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
2 of 7
ऑल वी इमेजिन एज लाइट
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ जब खत्म होती है तो आप दो लोगों को धन्यवाद देती हैं, अपनी नानी सतनी मलानी और सिस्टर लवली को। नानी की क्या यादें हैं आपके साथ?
ये फिल्म मेरी नानी की कहानी से ही शुरू होती है। मेरा बचपन नानी के साथ ही बीता है और उनका बहुत प्रभाव रहा है मेरे ऊपर। फिल्म में जो बुजुर्ग महिला आप देखते हैं जो अपने दिवंगत पति के बारे में बातें करती रहती है, वह मेरी नानी के जीवन से ली गई घटना है।
3 of 7
पायल कपाड़िया
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मतलब, आपकी नानी को भी आपके स्वर्गीय नाना दिखते थे?
जब मेरी नानी की उम्र करीब 95 साल थी तो उन्हें लगा कि उनकी याददाश्त जा रही है तो उन्होंने एक डायरी लिखनी शुरू की। इस डायरी में वह अपनी यादें लिखती थीं। मैंने उनकी अनुमति लेकर ये डायरी पढ़नी शुरू की तो उसमें उन्होंने लिखा है, “मेरे पति आए हैं मुझसे मिलने और वह वहां पर खड़े थे।”
4 of 7
पायल कपाड़िया
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ये तो बहुत दुखद अनुभूति रही होगी आपके लिए?
जब मेरी नानी 55 साल की थीं तो मेरे नाना गुजर गए। मैंने उन्हें कभी देखा नहीं। आप सोचिए मेरी नानी 55 साल से लेकर 95 साल तक अकेली थीं। मैं तो यही सोच रही थी कि जितने साल वह शादीशुदा नहीं रहीं, उससे ज्यादा जीवन तो उन्होंने अकेले बिताया। और, उस समय तो ये सोचना भी अजीब ही होता होगा कि कोई दूसरी शादी करे। उन दोनों के आपसी रिश्ते भी बहुत अच्छे नहीं थे, ऐसा मुझे मेरी मां ने बताया था।
5 of 7
ऑल वी इमेजिन एज लाइट
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, वह तंबाकू की महक, नाना का बिना बुलाए चले आना, इन सबके बिम्ब आपने फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ में बहुत ही अच्छी तरह खींचे हैं..
हां, वह अंग्रेजी में कहते हैं ना ‘ओड’, किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित कर की गई रचना। तो ये एक ओड है मेरी नानी के लिए। ये सब मैंने उनकी डायरी में ही पढ़ा। वह परेशान रहती थीं। उन्हें तंबाकू की महक आती रहती थी। और, ये सब पढ़ते हुए मैं वही सोचती थी कि ये जो पुरुष किरदार हैं, ऐसे किरदार जो हमारे जीवन में हमें नहीं चाहिए। फिर भी वे आते ही रहते हैं किसी भूत की तरह। ये वही है किसी जगह बिना बात के रुके रहना। रिश्तों का वह एहसास जो हम इस समाज के चलते आसानी से छोड़ नहीं सकते।