मुंबई मनोरंजन जगत में अपनी धाक जमा रहे ‘अमर उजाला’ प्रसार क्षेत्र से आए हुनरमंदों से बातचीत की सीरीज ‘अपना अड्डा’ में इस बार बारी है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले सहारनपुर में सरसावा ब्लॉक के गांव अगवानहेड़ा में जन्मे छोटन लाल सैनी यानी कि सी एल सैनी की। खेतों में खुद से ही बातें करने वाले सी एल सैनी को ’छोटे परदे का वेद व्यास’ भी कहा जाता है। धार्मिक धारावाहिकों के वह दिग्गज लेखक हैं। लेकिन, एक समय ऐसा भी रहा है जब मुंबई की सड़कों पर उन्होंने साइकिल से घूम घूमकर चाय बेची है। मुसीबतों में भी हिम्मत न हारने की मिसाल बन चुके सी एल सैनी से ’अमर उजाला’ की एक खास मुलाकात।
Apna Adda 12: छोटे परदे के वेद व्यास छोटन लाल सैनी की मार्मिक कहानी, बस मिला एक मौका फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा
ये मुझे भी नहीं पता कि मुझे ये लिखने की कला कैसे आई? मुझे तो इसके बारे में खुद पहली बार तब पता चला जब सरसावा में दसवीं क्लास में पढ़ते समय स्कूल में हुई एक निबंध प्रतियोगिता में मैंने पहली बार हिस्सा लिया और प्रथम पुरस्कार जीत लिया। उसके पहले तो घरवाले यही कहते थे कि इसमें कुछ तो गड़बड़ है, खेतों के बीच खड़े होकर खुद से बातें करता है, फिल्मों के डॉयलॉग बोलता रहा है। क्या ही करेगा, हमारा बालक! लेकिन, निबंध प्रतियोगिता जीती तो लिखने की ललक सी चढ़ गई। पिताजी इकाराम सैनी किसान थे। उनकी तरह मेरी मां भी अनपढ़ और वहां से निकलकर आज यहां तक मैं कैसे पहुंच गया, बस ईश्वर का आशीर्वाद ही कह सकते हैं।
कह सकते हैं कि बरास्ते रंगमंच। मैंने स्कूल की पढ़ाई करने के बाद जब कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई शुरू की तो उन्हीं दिनों मैं भारतीय जनता पार्टी के विधायक मोहर सिंह का पीए बन गया। खतो किताबत का काम मिला। मायावती भी उन्हीं दिनों मुख्यमंत्री बनी थीं और जब वह दारुलशफा वाला चर्चित कांड हुआ, तब मैं वहीं था। बाद में समाजवादी पार्टी के सांसद जगपाल सिंह के साथ भी रहा। लेकिन, एक जातीय विवाद के दौरान हुई बहस के बाद मैं सियासत से छिटका और रंगमंच पर आ गया। इप्टा के साथ जुड़कर कुछ नाटकों में अभिनय भी किया।
मैंने लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी में प्रवेश लेने की दो बार कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ। 1997 में मैं दिल्ली आ गया और वहां श्रीराम रंग सेंटर से दो साल का कोर्स किया। साहित्य कला परिषद की रिपर्टरी में काम भी चल निकला। ये सब करते करते मैंने नाटक और कविताएं भी लिखनी शुरू कर दीं। लेकिन, इसमें भी मन नहीं लग रहा था। कोर्स करने के लिए फीस के पैसे नहीं थे तो मुझे अपनी जमीन बेचनी पड़ी। मैं तभी मुंबई आना चाहता था, लेकिन इसके लिए पैसे ही नहीं थे। तो मैं घर चला गया। वहां से उत्तरकाशी गया। स्वांग करने वालों के साथ रहा। पहाड़ों की लोककथाओं पर नाटक लिखने का बड़ा मन था, लेकिन इस सबके लिए पैसे चाहिए थे..
मेरे भाई ने इसमें मेरी मदद की। उनसे मैंने 15 हजार रुपये लिए और 22 मार्च 2001 को मैं मुंबई आ गया। पता कुछ था नहीं शहर के बारे में। लोगों ने कहा बोरिवली उतर जाना। मैं उतर गया। कुछ जानने वाले मीरा रोड में रहते थे, मैं उनके पास चला गया। उन लोगों ने कुछ दिन तक साथ रखा और फिर सीधे मुंह पर ही बोल दिया कि भई, कहीं और इंतजाम कर लो, मेहमाननवाजी का वक्त अब पूरा हुआ!