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बाइस्कोप: कोरोना काल में देव आनंद और मुमताज की ये फिल्म ले चलेगी 50 साल पहले के आज जैसे भारत में

Wed, 13 May 2020 09:01 PM IST
प्रतीक्षा राणावत पंकज शुक्ल, मुंबई
पंकज शुक्ल, मुंबई Published by: प्रतीक्षा राणावत Updated Wed, 13 May 2020 09:01 PM IST
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tere mere sapne this day that year series by pankaj shukla 13 may 1971 bioscope dev anand vijay
तेरे मेरे सपने - फोटो : Social Media

बाइस्कोप में इन दिनों हम आपको बता रहे हैं उन फिल्मों के बारे में जिन्हें आप कोरोना काल में घर बैठे देखकर अवसाद में घिरने से बच सकते हैं। ये फिल्में जीवन का कोई न कोई संदेश दे जाती हैं और ऐसा ही एक संदेश लिए फिल्म है देव आनंद की 10 बेहतरीन फिल्मों में शुमार फिल्म, 'तेरे मेरे सपने'। कल मैंने आपको हेमा मालिनी की फिल्म 'अभिनेत्री' के बारे में बताया। आज की फिल्म में भी हेमा मालिनी हैं तो, लेकिन स्पेशल गेस्ट अपीयरेंस के तौर पर। अक्सर सिनेमा में क्लासिक फिल्मों का जिक्र होता है, ये वे फिल्में हैं जिन पर समय की धूल नहीं टिकती और वह हर दौर में प्रासंगिक बनी रहती हैं। इस समय कोरोना काल चल रहा है। हर तरफ कोरोना वारियर्स की जय जयकार हो रही है। और, इसमें सबसे आगे नंबर आता है चिकित्सकों का। निर्देशक विजय आनंद की फिल्म तेरे मेरे सपने शुरू ही होती है मेडिसिन को दुनिया का सबसे उत्तम पेशा बताकर उसको ये फिल्म समर्पित करने से। विजय आनंद ने इस फिल्म के साल भर पहले ही टिपिकल मसाला फिल्म 'जॉनी मेरा नाम' बनाई थी। और, 13 मई 1971 को रिलीज हुई उनकी ये बेहतरीन फिल्म 'तेरे मेरे सपने'। फिल्म ग्रामीण भारत में चिकित्सकों की हालत और उनको लेकर बनी धारणाओं पर करारी चोट करती है। और, ये हालात 50 साल बाद भी देश में ज्यादा बदले नहीं हैं।

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devanand

तो आज की फिल्म की कहानी शुरू करते हैं, चेतन आनंद, देव आनंद और विजय आनंद से। चेतन से आठ साल छोटे थे देव आनंद और देव आनंद से 11 साल छोटे थे विजय आनंद उर्फ गोल्डी। मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ाई के दिनों से ही विजय आनंद को थिएटर में मजा आने लगा था। लिखते वह कमाल का थे। कॉलेज से निकलते ही चेतन आनंद की पत्नी उमा ने उनको फिल्में लिखने के लिए खूब प्रेरित किया। अपनी उमा भाभी के साथ मिलकर ही विजय आनंद ने लिखी पहली फिल्म टैक्सी ड्राइवर। फिल्म हिट रही। उमा भाभी को भी अपने देवर जिसे प्यार से सब लोग गोल्डी बुलाते थे, पर नाज हुआ। लेकिन गोल्डी बहुत शर्मीले किस्म के इंसान थे। उन्होंने अगली कहानी लिखी, नौ दो ग्यारह। वह इसे निर्देशित भी करना चाहते थे, पर चेतन से तो खैर वह नजर ही नहीं मिला पाते थे, देव आनंद से भी कहने में उनकी जान निकलती थी। एक दिन देव आनंद कुछ दिनों की छुट्टियों के लिए महाबलेश्वर वाले अपने बंगले पर जा रहे थे। उन्होंने गोल्डी से फिल्म की स्क्रिप्ट मांगी कि रास्ते में पढ़ते चले जाएंगे। पता नहीं उस दिन छोटे भाई को क्या सूझा कि वह बोल बैठा, 'भैया, मैं चलूं साथ में। रास्ते में स्टोरी मैं खुद सुनाता हूं ना आपको।'

पढ़ें: बाइस्कोप: इस फिल्म से ड्रीम गर्ल को मिली थी ‘अभिनेत्री’ की पहचान, हो गए रिलीज के पूरे 50 साल

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देव आनंद, चेतन आनंद, विजय आनंद - फोटो : Social Media

देव आनंद वैसे ही अपने इस छोटे भाई से बहुत प्यार करते थे। दोनों भाई साथ चल पड़े मुंबई से महाबलेश्वर। कोई पांच घंटे के रास्ते में विजय आनंद ने जिस तरह से फिल्म की कहानी देव आनंद को सुनाई, उनको यकीन ही नहीं हुआ कि उनका छोटा भाई इतना सब कुछ जानता है फिल्ममेकिंग के बारे में। विजय ने न सिर्फ फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई बल्कि यहां तक बता दिया कि किस सीन की ओपनिंग क्या होगी, क्लोजिंग क्या होगी, शॉट डिवीजन क्या होगा और कैमरा कहां से कहां तक घूमेगा। कैमरे के एंगल और उसके मूवमेंट पर विजय आनंद की कमाल की पकड़ रही है। अगर आपने फिल्म ज्वैल थीफ का गाना ‘होठों में ऐसी बात में दबाके चली आई’ या फिर गाइड का गाना ‘कांटो से खींच के ये आंचल’ देखा होगा, तो आपको अंदाजा होगा कि गाने को परदे पर जीवंत कर देने का कैसा खास कौशल था विजय आनंद की शॉट टेकिंग में। खैर, देव आनंद महाबलेश्वर पहुंचे। रास्ते में विजय आनंद से उन्होंने  कुछ कहा नहीं। गोल्डी परेशान कि पता नहीं भैया को स्क्रिप्ट पसंद आई कि नहीं। कहीं बड़े भैया से क्लास न लगवा दें। हाथ मुंह धोकर फारिग होने के बाद देव आनंद ने छोटे भाई से कहा कि नवकेतन फिल्म्स को फोन लगाओ। नवकेतन की स्थापना देव आनंद और बड़े भाई चेतन आनंद ने मिलकर की थी और फैसले तब सबकी सहमति से ही होते थे। गोल्डी परेशान थे कि पता नहीं क्या होगा। फोन मिला। उधर घंटी बजी। नवकेतन के प्रचारक अमरजीत ने फोन उठाया। अमरजीत और गोल्डी तब साथ रहा करते थे। देव आनंद ने फोन पर कहा, अमरजीत, प्रेस में एनाउंस कर दो। नवकेतन की अगली फिल्म गोल्डी डायरेक्ट करेगा। नवकेतन फिल्म्स प्रजेंट्स फिल्म नौ दो ग्यारह डायरेक्टेड बाई विजय आनंद। उस रात विजय आनंद को नींद नहीं आई।

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तेरे मेरे सपने - फोटो : Social Media

और, उस सुबह के बाद किसी भी सुबह विजय आनंद ने कभी भी अपने बड़े भाई देव आनंद को अपने फैसले पर पछताने का मौका नहीं दिया। जो भरोसा देव आनंद ने उनके टैलेंट पर जताया उसे गोल्डी ने आखिर तक बनाए रखने की पूरी कोशिश की। नौ दो ग्यारह के बाद काला बाजार, फिर तेरे घर के सामने, गाइड, ज्वेल थीफ, जॉनी मेरा नाम और फिर तेरे मेरे सपने। तेरे मेरे सपने ही वह फिल्म है जिसने फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी और मराठी का झगड़ा शुरू किया। मुंबई में दादर के कोहिनूर सिनेमा में दादा कोंडके की फिल्म सोनगड्या लगी हुई थी। थिएटर मालिक को लगा कि देव आनंद की फिल्म है तो टिकट भी महंगी बिक सकती है और मुनाफा भी बढ़ सकता है तो उन्होंने दादा कोंडके की फिल्म हटाकर देव आनंद की ये फिल्म लगा दी। बात बाल ठाकरे तक पहुंची। शिव सेना का दफ्तर भी दादर में ही है। बस फिर क्या था, ठाकरे सीधे दफ्तर से निकले और जा धमके कोहिनूर थिएटर। देव आनंद की फिल्म के पोस्टर वहीं खड़े होकर उतरवाए और मराठी फिल्म फिर से वहां चलवाई। तेरे मेरे सपने एक तरह से विजय आनंद का विदा गान भी है। इसके बाद उन्होंने ब्लैकमेल, छुपा रुस्तम, बुलेट, राम बलराम और राजपूत जैसी फिल्में तो बनाईं, लेकिन गाइड या ज्वैल थीफ जैसा आकर्षण इन फिल्मों से कहीं गायब रहा। कहते हैं कि ठाकरे ने तेरे मेरे सपने को कोहिनूर सिनेमा से उतरवाकर मराठियों के बीच अपनी नाक तो ऊंची कर ली, लेकिन विजय आनंद को इससे बहुत बड़ा झटका भी लगा।

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विजय आनंद को ऐसा निर्देशक माना जाता है जिनकी सिर्फ फिल्में देखकर फिल्ममेकिंग सीखी जा सकती है। उन्होंने हर तरह की फिल्में बनाईं। कॉमेडी, थ्रिलर, एक्शन, मसाला, ड्रामा, म्यूजिकल, सोशल, सब। कहानी के हिसाब से कलाकारों को चुनने में उनकी महारत का तो जवाब ही नहीं। गाइड में वहीदा रहमान, ज्वैल थीफ में वैजयंती माला, तीसरी मंजिल में शम्मी कपूर और तेरे मेरे सपने में मुमताज। मुमताज के लिए इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा की पहली कतार की हीरोइनों में शामिल होने का दरवाजा खोला। विजय आनंद अक्सर अपनी हीरोइनों में नूतन और वहीदा रहमान का जिक्र उनकी भावप्रवण आंखों के लिए किया करते थे। नंदा को वह एक बहुत ही कुशल अभिनेत्री मानते थे और आशा पारेख का जिक्र वह उनकी शरारतों को लेकर किया करते थे। तेरे मेरे सपने में मुमताज को जब वह लाए तो उन्हें इस हीरोइन में एक शानदार नर्तकी और अभिनेत्री दिखी। अगर आप विजय आनंद की फिल्मों की हीरोइनों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस निर्देशक को हमेशा अपनी कहानी के महिला किरदारों की सादगी पर फख्र रहा और इन किरदारों के लिए उन्होंने कलाकार भी ऐसे ही चुने।

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