Movie Review: सायना
कलाकार: नायशा कौर भटोये, परिणीति चोपड़ा, मेघना मलिक, मानव कौल, एहसान नकवी, शुभ्रज्योति, अंकुर आदि
लेखक: अमोल गुप्ते, अमितोश नागपाल
निर्देशक: अमोल गुप्ते
निर्माता: भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, सुजय जयराज और रशेश शाह
रेटिंग: ***
किसी खिलाडी की बायोपिक बनाना आसान नहीं होता। पहले तो ये कि हर अभिनेता खिलाड़ी भी रहा हो जरूरी नहीं होता और दूसरे ये भी कि हर खिलाड़ी के जीवन में इतनी नाटकीयता हो ही, ये भी जरूरी नहीं है। फिल्म ‘साइना’ में अमोल गुप्ते के सामने चुनौतियां ढेर सारी रही हैं। सिर्फ इतनी ही नहीं कि फिल्म अटक अटक कर बनने में बरसों लग गए बल्कि उन्होंने खेल ऐसा चुना है जिसे खेलने वाले गली मोहल्ले में तो बहुत हैं लेकिन अभिनय करने वाले इसे बहुत कम खेलते हैं। लेकिन, अमोल कमाल के निर्देशक हैं। तकनीशियन भी बहुत ही अच्छे हैं। कैमरे के जरिए कहानी कहने में उनका जोड़ नहीं हैं। बस उन्हें अपना खुद का तोड़ इस बात के लिए निकाल लेना चाहिए कि आखिर उनकी फिल्म में उनकी अपनी कितनी चलनी चाहिए और कितनी दर्शकों की पसंद की।
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सायना मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘साइना’ अमोल ने दर्शकों की पसंद के हिसाब से ही बनानी शुरू की थी। उन दिनों श्रद्धा कपूर को देख लग रहा था कि दीपिका पादुकोण के बाद नंबर 2 की कुर्सी पर वही काबिज होने वाली हैं। अमोल के साथ साइना बनकर उन्होंने शूटिंग शुरू भी कर दी लेकिन ये सिनेमा है। और, सिनेमा में जब तक सब कुछ रिलीज न हो जाए, कुछ भी हो सकता है। यहां बनी फिल्में रिलीज होने में बरसों लग जाते हैं और सानिया जैसी पूरे जोशो खरोश से शुरू फिल्में बनने में भी बरसों लग सकते हैं। फिल्म ‘साइना’ का बनना और रिलीज होना ही अपने आप में एक बड़ा सबक है सिनेमा का। अमोल गुप्ते ने बतौर निर्देशक अपना हौसला, हिम्मत और हुनर फिर एक बार बड़े परदे पर पेश किया है। परिणीति चोपड़ा में भले उन्हें एक काबिल कलाकार इस रोल लायक न मिला हो लेकिन फिल्म ये जरूर देखी जानी चाहिए।
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सायना मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अमोल गुप्ते का सिनेमा एहसास का सिनेमा है। ये एहसास ऐसे हैं जो हो सकता है आपको परदे पर दिखें ना। इन एहसासों को किरदारों की मनोदशा में देखने वाली आंखें चाहिए। नंबर दो पर आई बिटिया को मां से मिला तिरस्कार आपको भीतर तक हिला सकता है। आम अभिभावक बच्चे के दूसरी पोजीशन पर हवा में हो सकते हैं। लेकिन, यहां एक मां है जिसे नंबर एक से कम कुछ नहीं चाहिए। एकाध फिल्में इन मांओं के मनोविज्ञान पर भी अलग से बननी चाहिए। सानिया ने जीवट दिखाया और मां का सपना पूरा कर दिया, दुनिया की नंबर एक बैडमिंटन खिलाड़ी बनकर। फिल्म के इन लम्हों में ऋतिका फोगट बहुत याद आई। क्या उसके साथ भी किसी ने नंबर दो आने पर ऐसा सलूक किया था?
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सायना मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
उषा और हरवीर सिंह नेहवाल की बिटिया सानिया की ये बायोपिक कुछ कुछ वैसी ही है जैसी निर्देशक नीरज पांडे ने महेंद्र सिंह धोनी के गौरव गान के लिए बनाई थी, उनकी अनटोल्ड स्टोरी के नाम से। फिल्म में वह सब कुछ है जो धोनी ने दिखाना चाहा। ऐसा कुछ भी नहीं है जो धोनी को धोनी बनाने वालों ने देखना चाहा। एक बायोपिक को बनाने का उद्देश्य ही उसके भविष्य में याद रह जाने और न रह जाने लायक सिनेमा के बीच की लकीर बनता है। फिल्म में वह कुछ नहीं है जिसके चलते सानिया कई बार सुर्खियों में रहीं। सानिया नेहवाल की ये बायोपिक एक ब्रांडिग एक्सरसाइज है लेकिन इसके बाद भी इस फिल्म का वह हिस्सा अद्भुत है जिसमें साइना अभी बच्ची ही होती है।
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सायना मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
साइना नेहवाल पर बनी फिल्म ‘साइना’ का पहला हिस्सा जिसमें उनका किरदार एक असल बैडमिंटन खिलाड़ी नायशा ने निभाया है, कमाल का है। उनकी सर्विस, उनका साइड लाइन के बीच में बिजली सा इधर से उधर चमकना, नेट के पास से शटल को पकड़ना और दूसरी तरफ से बनी वॉली पर स्मैश मारना, उनका हर स्टांस सांसें रोक देने वाला है। लगता ही नहीं कि आप फिल्म देख रहे हैं। बायोपिक असल में यही होती है। मन करता है कि बस साइना बड़ी न हो और बड़ी भी हो तो बस ऐसे ही खेलते हुए बड़ी हो जाए। लेकिन ये हिंदी सिनेमा है। यहां हीरो या हीरोइन बिना फिल्म कम ही सोची जाती है। फिल्म में परिणीति आती हैं। लोगों की उम्मीदें बुझने सी लगती हैं। लेकिन, परिणीति ने मेहनत में कसर नहीं छोड़ी है। बस, मामला ही यहां भी उनकी पहुंच के बाहर का ही है।