-निर्माताः मनीष मुंदड़ा
-निर्देशकः अमित वी. मासुरकर
-सितारेः राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, राजपाल यादव, अंजली यादव
रेटिंग ****
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव के मायने क्या हैं? जबकि चुनाव से पहले वादे-इरादे-झांसे खूब चलते हैं। एक वोट की कीमत क्या सचमुच हमें मालूम होती है? निर्देशक अमित वी. मासुरकर की फिल्म न्यूटन चुनावों को लेकर एक ब्लैक कॉमेडी है। लोकंतत्र चलाने और चुनाव कराने वालों समेत चुनावी महायज्ञ में मत-आहुति डालने वालों को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। यह एक नई किस्म की फिल्मों का दौर है जिसमें जमीन से जुड़ा आदमी और अपनी जमीन की कहानियां लौटी हैं। न्यूटन उनमें सामने आई एक बेहतरीन फिल्म है जो बदलते हुए दौर में नई सोच के आयाम खोलती है। मासुरकर ने इससे पहले फिल्म सुलेमानी कीड़ा बनाई थी, जो फिल्म इंडस्ट्री में लेखकों के संघर्ष की कहानी थी। ब्लैक कॉमेडी।
न्यूटन सवाल उठाती है कि क्या लोकतंत्र और चुनाव में हर काम कायदे से चलता है? फिल्म का मुख्य पात्र नूतन कुमार उर्फ न्यूटन (राजकुमार राव) है, जिसे अपने ईमानदारी होने पर गर्व है। उसकी ड्यूटी नक्सल प्रभावित इलाके में चुनाव कराने के लिए लगी है। यहां नक्लसियों से लड़ रहे जवानों के लीडर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी), रिटायरमेंट के कगार पर खड़े मंजे हुए सीनियर अधिकारी लोकनाथ (राजपाल यादव) और स्कूल टीचर मलकू (अंजली पाटिल) भी हैं। किस तरह होगा चुनाव नक्सलियों के डर के बीच? कौन वोट डालेगा? कैसे बचेगा लोकतंत्र और कौन बचाएगा इसे?
फिल्म नक्सल और आदिवासियों से जुड़े कई सवाल कॉमिक और अप्रत्यक्ष ढंग से उठाती है। एक तरफ विशाल देश में मॉल, स्काई वॉक, चमकती रोशनियों वाली गाड़ियों समेत बुलैट ट्रेन के सपने हैं और दूसरी तरफ वे आदिवासी जो जंगलों में अब भी पिछड़ा हुआ जीवन जी रहे हैं। जबकि उन्हीं के पास वह धरती है जहां से प्राकृतिक संसाधन लाकर देश को संपन्न बनाया जाता है। लोकतंत्र में इन आदिवासियों की जगह कहां है और उन 76 वोटों का मूल्य क्या सचमुच है या फिर एक मजाक भर है, जहां न्यूटन चुनाव कराने गया है? आप खुद सोच सकते हैं।
मासुरकर ने नए ढंग से लोकतंत्र, चुनाव और व्यवस्था को देखा है जिसे आम तौर पर देखना कोई जरूरी नहीं समझता। न्यूटन बिना शोरशराबे के बात करती है। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य के जंगलों में शूट की गई फिल्म एक अलग अनुभव है। जिसे राव, त्रिपाठी, यादव और अंजली जैसे ऐक्टर नई ऊंचाई देते हैं। खास तौर पर राजकुमार राव तारीफ के काबिल हैं। मगर पंकज त्रिपाठी भी पीछे नहीं रहते। दोनों के किरदार एक-दूसरे के विपरीत हैं और शुरुआत के दस मिनटों के बाद उनकी खूबसूरत कॉमिक टाइमिंग गुदगुदाना शुरू कर देती है। कहानी में एंटरटेनमेंट और मैसेज दोनों हैं।