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'प्यार का पंचनामा' करने वाले एक्टर की दो टूक, कोई स्टार फिल्म चलने की गारंटी नहीं दे सकता

मनोरंजन डेस्क,अमर उजाला Updated Tue, 25 Sep 2018 05:37 PM IST
divyendu sharma
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प्यार का पंचनामा और चश्मे बद्दूर जैसी कॉमिक फिल्मों से करिअर शुरू करने वाले दिव्येंदु शर्मा बॉलीवुड में अपनी जमीन तलाश रहे हैं। टॉयलेट: एक प्रेमकथा में वह अक्षय कुमार के साथ थे और अब बत्ती गुल मीटर चालू में वह शाहिद कपूर से ज्यादा प्रभावी नजर आए। दिव्येंदु शर्मा से उनके सिनेमा को लेकर रवि बुले की बातचीत...
divyendu sharma
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-आपको इंडस्ट्री में सात साल हो रहे हैं। आपके काम में रफ्तार नहीं है। गिनती की सात-आठ फिल्में हैं। क्या वजह है?
-वजह सीधी-सी है कि मैं बहुत ज्यादा फिल्मों में नहीं आना चाहता। मैं कुछ खास किरदार ही निभाना चाहता हूं। दोहराव  नहीं चाहता। अत: समय लगता है। यहां जैसी फिल्म से आप डेब्यू करते हैं, वैसे ही खांचे में ढाल दिए जाते हैं। अत: उससे बाहर आने में ही वक्त निकल जाता है। मैं नहीं चाहता कि एक के बाद एक कॉमेडी करता रहूं। इसलिए बीच में इक्कीस तोपों की सलामी या बत्ती गुल मीटर चालू जैसी फिल्म भी करता हूं। जिनमें ड्रामा हो।
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divyendu sharma
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-एक जैसे रोल नहीं चाहते तो कइयों को ना कहना पड़ता होगा। इससे लोग नाराज होते हैं!
- यह सच है लेकिन मैं किसी को नाराज नहीं करना चाहता। मैं बड़ी तमीज से बोलता हूं कि आपकी फिल्म अच्छी है, रोल अच्छा है परंतु मैं किरदार नहीं दोहराना चाहता। मैं वास्तव में अच्छा काम करना चाहता हूं और करिअर के इस स्टेज पर फाइनली मेरे लिए कुछ दरवाजे खुले हैं। कम फिल्में करना शायद अब काम आएगा। आप एक जैसे रोल करते हैं तो उससे बनी छवि तोड़ने में खुद को ही नहीं, बाकी लोगों को भी कठिनाई पेश आती है।
divyendu sharma
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कई ऐक्टर इसे सुरक्षित मानते हैं कि इमेज बनने से काम मिलता रहता है।
- बिल्कुल सही है क्योंकि ऐसा होने पर लोग कहते हैं कि भाई निकल पड़ी। फार्मूला चल पड़ा। परंतु मैं मुंबई इसलिए नहीं आया कि बहुत सारा पैसा कमा लूं, फ्लैट-गाड़ी बना लूं। ज्यादा पैसा बुरा नहीं लगता मगर एक जैसे रोल निभा कर पैसा नहीं बनाना चाहता। फिर ऐक्टर के रूप में मेरी तैयारियों का कोई मतलब नहीं। शुरुआत के तीन-साढ़े तीन साल स्ट्रगल करने का कोई मतलब नहीं। एक ही चीज रोज करना होती तो नौकरी कर लेता।

 
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दिव्येंदु शर्मा
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क्या हमारी फिल्मों में इतनी विविधता है कि ऐक्टर के रूप में आपकी भूख शांत कर सकें?
- ऐसे मौके कम हैं मगर अंतत: ऐसा दौर आया है जब अलग-अलग तरह की फिल्में बनने लगीं। अब आप नहीं कह सकते कि फिल्म में एक हीरो होता है और वही पूरी कहानी को खींच कर ले जाता है। आज अलग-अलग किरदार और नई-नई कहानियां हैं क्योंकि इंडस्ट्री में विभिन्न जगहों से तरह-तरह के लोग अपनी कहानियां लेकर आ गए हैं। 80 फीसदी फिल्में भले ही एक-सी बन रही हों परंतु 20 फीसदी में नए काम का मौका खुल गया है। मैं इस 20 फीसदी में अपनी जगह ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं।
 
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