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अनुभव ने बताया कहां से आई 'मुल्क', कहा- जानकारी कम मिलती थी, गुस्सा ज्यादा आता था

Mon, 13 Aug 2018 09:23 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Mon, 13 Aug 2018 09:23 PM IST
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Changes in thinking comes from books says mulk director anubhav Sinha
anubhav sinha

मसाला फिल्मों के निर्देशक के रूप में प्रसिद्ध अनुभव सिन्हा की 'मुल्क' की गूंज इन दिनों हर तरफ है। उनकी फिल्मोग्राफी देखते हुए किसी को अनुमान नहीं हुआ कि वह आज के जलते हुए प्रश्नों पर फिल्म बना सकते हैं। परंतु उन्होंने ऐसा किया। बीते कुछ वर्षों में आखिर क्या हुआ अनुभव की जिंदगी में कि उनकी सोच बदल गई। बता रहे हैं रवि बुले


 

Changes in thinking comes from books says mulk director anubhav Sinha
अनुभव सिन्हा
अनुभव सिन्हा की पहली फिल्म थी 'तुम बिन' एक रोमांटिक कहानी जिसके गाने आज भी सुने जाते हैं। फिल्म चली। अनुभव इंडस्ट्री में जम गए। इसके बाद उन्होंने सितारों को लेकर 'आपको पहले भी कहीं देखा है', 'दस', 'तथास्तु' 'कैश' 'रावन', और 'तुम बिन 2' जैसी फिल्में बनाई। लेकिन हाल में जब लोगों ने उनकी मुल्क देखी तो हैरान हुए। क्या यह वही अनुभव हैं, जिनकी पिछली फिल्मोग्राफी बिल्कुल ही अलग रंगों वाली है। उसे देख कर कल्पना नहीं होती कि अनुभव की अगली फिल्म 'मुल्क' होगी। सब हैरान हैं कि आखिर क्या हुआ कि अनुभव की सोच में यह जबर्दस्त बदलाव आया। यह बात तो खुद अनुभव मानते हैं कि 'मुल्क' उनकी अब तक की सबसे खास और महत्वपूर्ण फिल्म है। आखिर पिछले कुछ वर्षों में अनुभव के जीवन में बदलाव कैसे आया, इसका एक ही जवाब है, किताबें। साहित्य और इतिहास की किताबें।
 
Changes in thinking comes from books says mulk director anubhav Sinha
anubhav sinha
अमर उजाला बातचीत में अनुभव ने कहा, चूंकि मैं यूपी बोर्ड में पढ़ा तो कुछ हद तक साहित्य वहां कोर्स में ही होता है। प्रेमचंद, सुमित्रा नंदन पंत से लेकर शेक्सपीयर तक। फिर मैं इंजीनियरिंग पढ़ने चला गया। तब साहित्य और इतिहास पढ़ने की जरूरत नहीं रही। वह आदत से निकल गया। 'वह कैसे लौटे इन्हें पढ़ने की तरफ' वह कहते हैं, तकरीबन चार-पांच साल पहले मैं बहुत परेशान था कि कश्मीर में चल क्या रहा है। मुझे कुछ मालूम नहीं था। अखबारों और टीवी से जानकारी कम मिलती है, गुस्सा ज्यादा आता है।

 
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Changes in thinking comes from books says mulk director anubhav Sinha
anubhav sinha
मैंने सोचा कश्मीर के बारे में पढ़ता हूं। मैं जानने को उत्सुक था। एक किताब थी बशारत पीर की और एक थी राहुत पंडित की। मैं नहीं जानता था कि उनकी किताबें कितनी मशहूर थीं। पहले बशारत की किताब पढ़ी और फिर मुझे अहसास हुआ कि मुझसे क्या छूट रहा था। यह दो-ढाई साल पुरानी बात है। इसके बाद फिर से मेरी पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ। मैं किताबों से घिर गया। अब मैं पढ़ रहा हूं। एक-एक वक्त में दो-दो, तीन-तीन किताबें पढ़ता हूं।

 
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anubhav sinha
अनुभव मानते हैं कि बीते कुछ वर्षों में मुझमें यह बड़ा फर्क आया है। एक इंसान के रूप में भी और एक निर्देशक के रूप में भी। मैं पढ़ने लगा हूं। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया भी पढ़ी। अनुभव फिलहाल तीन किताबें पढ़ रहे हैं। अयोध्या: द डार्क नाइट (धीरेंद्र झा), अमृतसर (मार्क टुली और सतीश जैकब) और द ब्लड टेलीग्राम (गैरी जेण्बास)। यह किताब 1971 में बांग्लादेश में नरसंहार पर अमेरिकी उदासीनता पर आधारित है। वह बताते हैं, इस बीच मैंने प्लेटो समेत बहुत कुछ पढ़ा। 

 
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