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World Environment Day: पर्यावरण के मोर्चे पर ये हैं भारत की 10 बड़ी चिंताएं, इंसानों पर भी पड़ेगा प्रभाव!

Sat, 05 Jun 2021 04:53 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: देवेश शर्मा Updated Sat, 05 Jun 2021 04:53 PM IST
सार

अगर हमारे हुक्मरानों और नीति - नियंताओं ने इन मुद्दों पर समय रहते गौर करके बचाव के कदम नहीं उठाए तो भविष्य में बहुत देर हो चुकी होगी। देश और आने वाली पीढ़ियों को इसका नुकसान भुगतना पड़ सकता है। 

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World Environment Day 10 big concerns of India on the environmental front, it will affect humans too
विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : iStock

भारत समेत दुनियाभर में शनिवार, 05 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। लेकिन आज दुनिया के कई देश पर्यावरण संकट से जूझ रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं को सामना करने को मजबूर हैं। इनसे हमारा देश भी अछूता नहीं है। पिछले कुछ सालों से लगातार आ रहे भूकंप के हल्के झटके हों या विभिन्न छोटे-बड़े तूफान चक्रवात। भारतीय उपमहाद्वीप में भारतीय सीमाओं को छू रहे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी का चक्रवाती तूफानों के नए केंद्र के तौर पर उभरना, या फिर हिमालय क्षेत्र और उत्तराखंड में लगातार ग्लेशियर पिघलने और टूटने से जलजले की घटनाएं हों। इन सभी का इशारा प्राकृतिक तबाही की ओर है। बेशक इनके पीछे जलवायु परिवर्तन, जल और वायु प्रदूषण जैसे अनेक कारण हैं। 


लेकिन यह बात सत्य है कि वर्तमान में देश दोहरे मोर्चे पर लड़ रहा है। एक मोर्चा वैश्विक संक्रामक महामारी कोविड-19 के प्रकोप का है तो दूसरा पर्यावरण के मानदंडों पर अच्छा प्रदर्शन न कर पाने का है। हम कह सकते हैं कि भारत में 2021 का विश्व पर्यावरण दिवस सबसे कठिन समय में मनाए जाने वाला दिन रहा है। जहां एक ओर भारत अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर देश में जल और वायु अभी भी उतने ही प्रदूषित हैं, और वन क्षरण भी बदस्तूर जारी है। विश्व पर्यावरण दिवस पर भारत की 10 बड़ी चिंताओं के बारे में बात करना बेहद अहम है, जो हमारे भविष्य से जुड़ी हैं। अगर हमारे हुक्मरानों और नीति - नियंताओं ने इन मुद्दों पर समय रहते गौर करके बचाव के कदम नहीं उठाए तो भविष्य में बहुत देर हो चुकी होगी। देश और आने वाली पीढ़ियों को इसका नुकसान भुगतना पड़ सकता है। 
 

World Environment Day 10 big concerns of India on the environmental front, it will affect humans too
world environment clean in Coronavirus lockdown - फोटो : PTI

मई 2021 में वैश्विक स्तर कोरोना से मरने वालों की संख्या 30% भारत से है। यहां पहली लहर के विपरीत, दूसरी लहर शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक फैल गई। मई 2021 में, 52% नए मामले और 53% मौतें ग्रामीण क्षेत्रों से हुईं और स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों से पता चला कि गांवों में कोविड का प्रसार अप्रैल से शुरू हुआ और मई में इसका प्रकोप देखने को मिला।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की वार्षिक पर्यावरण रिपोर्ट के डेटा से पता चलता है कि कोविड -19 महामारी के साथ खराब वातावरण ग्रामीण भारत पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है, जहां स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा बहुत खराब है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में गांवों में चिकित्सा मानव संसाधन की 78% और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की 32% कमी है। 



भले ही भारत आज इन दोहरे संकटों से जूझ रहा है, भविष्य की कुंजी पारिस्थितिकी तंत्र  (Ecosytem) की बहाली में निहित है - इस वर्ष के विश्व पर्यावरण दिवस की थीम भी यही है। पारिस्थितिकी तंत्र बहाली का मूल रूप से मतलब पुराने जल निकायों को पुनर्जीवित करना, प्राकृतिक वनों का निर्माण, वन्य जीवन को स्थान प्रदान करना और जलीय जीवन को बहाल करने के लिए जल प्रदूषण को कम करना है। समृद्ध जैव विविधता के साथ स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र, अधिक उपजाऊ मिट्टी, लकड़ी और मछली की बड़ी पैदावार और ग्रीनहाउस गैसों के बड़े भंडार जैसे अधिक लाभ प्रदान करते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इस दशक को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए समर्पित किया है।
भारत को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर काम करने की इसलिए भी जरूरत है क्योंकि देश में पानी और हवा की गुणवत्ता बिगड़ रही है और लोगों और कृषि पर जलवायु संकट का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। आइए जानते हैं भारत के लिए 10 प्रमुख पर्यावरणीय चिंताएं हैं।

World Environment Day 10 big concerns of India on the environmental front, it will affect humans too
environment - फोटो : environment

जलवायु संकट
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों से पता चलता है कि गर्मी सभी मौसमों में हो रही है, गर्मी और सर्दियों के तापमान में औसत अंतर 1901 में चार डिग्री सेल्सियस की तुलना में पांच डिग्री सेल्सियस है। रिकॉर्ड देखें तो पता चलता है कि 2020 पर आठवां सबसे गर्म वर्ष था और 2009 के बाद 2016 अब तक का सबसे गर्म वर्ष था। वहीं, 2006-2020 के दौरान पिछले 15 वर्षों में से 12 सबसे गर्म वर्षों में दर्ज किए गए और 2011-20 रिकॉर्ड सबसे गर्म दशक रहा है।
यह भारत के लिए एक चेतावनी है, जिसमें 2020 में औसत वार्षिक तापमान 25.78 डिग्री सेल्सियस रहा है। सीएसई की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत के सबसे गरीब और आबादी वाले राज्य बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जलवायु संकट की चपेट में सबसे अधिक थे। इसके आकलन का भेद्यता सूचकांक 14 संकेतकों पर आधारित है, जिसमें लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल राज्यों की क्षमता आदि बिंदु शामिल हैं। 
जलवायु संकट का सबसे बड़ा मानवीय परिणाम बड़े पैमाने पर विस्थापन है। आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र (IDMC) के अनुसार, भारत दुनिया का चौथा सबसे खराब जलवायु प्रेरित आपदा प्रभावित देश है, और मई तक 2020 और 2021 में बाढ़, तूफान और चक्रवात जैसी कई आपदाओं का सामना कर चुका है। भारत भूकंप, सुनामी, चक्रवात, तूफानी लहरों और सूखे सहित अन्य अचानक और धीमी गति से शुरू होने वाले खतरों से भी ग्रस्त है। सीएसई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2011-2020 के दशक में 33 चक्रवात देखे गए, जो 1971 के बाद सबसे अधिक हैं। भारत में 2008 और 2020 के बीच औसतन लगभग 37 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए। इनमें से अधिकांश बाढ़ के कारण विस्थापित हुए हैं। 
 

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कृषि क्षेत्र - फोटो : pixabay

कृषि संकट 
भारत में मिट्टी और भू-जल को दूषित करने वाले कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के साथ पर्यावरण क्षरण भारतीय कृषि के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कृषि समृद्ध जिलों में लगभग आधा भू-जल दूषित है। इन राज्यों में अधिक उपयोग के कारण भूजल भी घट रहा है। मार्च 2021 में प्रकाशित अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि भू-जल के घटने से विशेष रूप से हरियाणा और पंजाब जैसे गेहूं उगाने वाले राज्यों में 2025 तक 20% तक कृषि उपज यानी पैदावार में गिरावट आएगी।
जलवायु संकट का प्रभाव कृषि पर साफ-साफ दिखाई देता है। मौसम विभाग की रिपोर्ट में ओलावृष्टि, अतिरिक्त बारिश और तूफान जैसी मौसमी घटनाओं में वृद्धि हुई है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है, इन कारकों के कारण भारत में किसानों की आत्महत्याएं होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2018 के 5,763 की तुलना में 2019 में 5957 किसानों की आत्महत्या की है।
भले ही भारत सरकार ने जैविक खेती के लिए एक मिशन शुरू किया है, लेकिन भारत की 14  हेक्टेयर कृषि भूमि में से केवल दो प्रतिशत का उपयोग जैविक खेती के लिए किया जाता है। सीएसई की पर्यावरण रिपोर्ट की स्थिति में कहा गया है कि सिक्किम (100%) में जैविक खेती सबसे अधिक है, इसके बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (60%) है, लेकिन कृषि समृद्ध राज्यों पंजाब (0.4%) और हरियाणा (0.7%) में बहुत कम है।

 

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बेकाबू जलप्रदूषण - फोटो : सोशल मीडिया

जल संकट 
मार्च 2020 में प्रकाशित भारत में जल स्रोत और चुनौतियां एक अध्ययन में कहा गया है कि भारत में लगभग 80% सतही जल डंप सीवेज और कचरे के कारण प्रदूषित है। जबकि भूजल का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न कार्बनिक और अकार्बनिक स्रोतों से खतरनाक स्तर पर दूषित है। अधिकांश स्थानों पर जल निकाय सिकुड़ रहे हैं। लघु सिंचाई (एमआई) की जनगणना के अनुसार, 2001 और 2006 के बीच जल निकायों में लगभग 8% की गिरावट आई है और अन्य 10% पानी की खराब गुणवत्ता के कारण उपयोग करने योग्य नहीं था। देश के 1.3 अरब लोगों में से आधे से भी कम लोगों को सुरक्षित साफ पेयजल मिलता है। हालांकि, सुरक्षित साफ पेयजल सुनिश्चित करने के लिए जल शक्ति मंत्रालय महत्वाकांक्षी और सक्रिय रूप से 2024 तक हर घर को नल के पीने के पानी से जोड़ने के अपने मिशन पर काम कर रहा है। 
वहीं, आम धारणा के विपरीत, भारत की 19 प्रमुख नदियों के पानी की गुणवत्ता में कोविड-19-प्रेरित लॉकडाउन के दौरान उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा और चार अन्य नदियां पुन: गंदी हो गई हैं, जबकि सात अन्य नदियों में पानी की गुणवत्ता अपरिवर्तित रही। रिपोर्ट के अनुसार, गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी भारत की प्रमुख नदियों में पानी की गुणवत्ता में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया है, बावजूद इसके सरकार ने सीवेज को सीधे नदियों में बहने से रोकने के लिए समृद्ध उपचार संयंत्रों की स्थापना के लिए भारी मात्रा में धन खर्च किया है। 

 

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